ॐ श्री गुरुभ्यो नमः

मैं तृणों की नोक सा हूँ तुम गहन आकाश से हो
मैं अकिंचन, मैं प्रवासी, मुक्ति के तुम द्वार से हो।
तुम अभय के हो प्रदाता,
सीस चरणों में नवाऊँ
तुम प्रथम, अन्तिम तुम्हीं इस दीन के विश्वास से हो।।
अनुक्रमणिका
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1 |
तुम प्रतिबिम्बित कण कण में |
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हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ! |
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3 |
जो मिल गया सम्हाल ले |
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प्रभु का यह मन्दिर है |
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राम को नाम अधार है |
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जय जय हे गुरुदेव! |
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फिर माटी माटी में धर दी |
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हे अंशुमान ! |
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9 |
पीत पात झड़ते हैं |
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नेपथ्य के उस पार |
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11 |
पीड़ा |
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नयनों की भाषा पढ़नी है |
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13 |
मैं बरसती बूँद में हूँ |
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दिल में फाँस चुभती है |
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दीप मैं अविचल अकम्पित |
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वे मेरे ही आँसू हैं |
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पत्र तुम्हारा मेरी थाती |
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कुछ तो उसकी बात करो |
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खाक बस तेरी बचेगी |
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20 |
मौसम बीता जाय |
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21 |
ओ प्रवासी मानसर के |
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पत्थर में फूल खिलाओ |
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यह मेरा इन्दौर है |
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जागा अरुणिम भोर प्रिये |
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मैं थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ |
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26 |
मन मीत कोई गाने लगता है |
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गीत सृजन के गावेंगे |
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दो दिये दो जिन्दगी |
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29 |
स्मृतियों में सदा जियूँगा |
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30 |
ऐ जिन्दगी |
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31 |
कस्तूरी के मृग |
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32 |
तुम न आए |
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33 |
दीप जलता रहा |
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34 |
प्राण की वंशी |
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मुक्तक |
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तुम्हें सौंपता हूँ |
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37 |
पीर मेरी मधुबनी |
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सिलवटों के पार से |
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39 |
सेवा का हवन कुण्ड |
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40 |
सभी आईना पहन लें |
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41 |
खामोश चिट्ठी |
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42 |
गर मैं पागल होता |
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43 |
ऐ! नभ ऐ! विराट |
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44 |
गगन तुम्हारे अमित रूप |
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45 |
बारिश की बूँदें |
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46 |
आइना कहता रहा |
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47 |
कौन दस्तक दे रहा है। |
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48 |
मेरा उपवन बुला रहा है |
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49 |
जिद कर बैठा हूँ |
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50 |
जीवन की चादर |
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51 |
अमर प्रीत मेरी |
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52 |
बिखर गए सब सपने |
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53 |
कोरोना महामारी (कोविड -19) |
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54 |
नेह की वही शपथ |
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55 |
बिन तुम्हारे क्या करूँगा |
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56 |
धरा का श्रृंगार |
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57 |
अनकहे संवाद गूँजे |
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58 |
उम्र कलम की कच्ची है |
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59 |
अनमने हैं घाट पनघट |
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60 |
दुबका बैठा जीवन है |
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61 |
मधुगीत गुन गुन कर रहा |
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62 |
शब्द में हैं अर्चनाएँ |
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63 |
खपरैली बस्ती में |
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64 |
मौन है चिर प्रीत मेरी |
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65 |
भोर की रश्मियाँ |
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66 |
सपने सारे संग ले गये |
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67 |
नेपथ्य के उस पार |
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68 |
यों ही मुझको भूल सकोगी? |
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69 |
दिल का दर्पण टूट गया |
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70 |
तिरछी लकीरें |
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71 |
गीत गाता हूँ मैं |
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72 |
झुर्रियों की शक्ल में |
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73 |
गाओ रे! झूम झूम! |
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74 |
इस तरह सिमट गए |
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75 |
चल रे जीवन उछल उछल |
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आत्मिका
"विद्युल्लता के स्पन्दन गीत"
कहते
हैं कि हृदय के तारों पर मानवीय संवेदना के संघात से उत्पन्न आत्मस्वर ही गीत है अर्थात् गीत अपनी आत्मरागात्मिकता में जीवन का झंकृत स्वर है। अपने चारों ओर मौजूद विषय, वस्तु, प्रकृति, जीव, जगत की ओर संवेदनात्मक दृष्टि से देखने पर जो स्पन्दन महसूस होते हैं वे गति, यति, लय, स्वर, ताल में निबद्ध हो जावें तो गीत बन जाते हैं लेकिन कभी कभी ये स्वयं यह पूरा बाना पहन कर हृदय में खुद ही उतर आते हैं। लय सुंदरता की चरम विधा है और सुंदरता का सीधा सम्बन्ध हृदय से है। यही लय साहित्य में छंद का रूप धारण करती है। काव्य एवं संगीत विधान के लिए उपयुक्त शब्दों की लययुक्त व्यवस्था का नाम ही छंद है। इस कृति के लगभग सारे गीत भावनाओं, संवेदनाओं और स्वसौष्ठव स्वकीय ले कर उतरे हैं। "जो है जैसा
है, यहाँ वैसे का वैसा है।"
'विद्युल्लता', 'विद्युल्लता' क्यों हुई
?
विद्युत
का भौतिक जीवन आधार -
मेरी
स्नातकीय शिक्षा विद्युत यांत्रिकी में हुई और बाद में मैं विद्युतयंत्री के रूप में सेवा रत रहा। वस्तुतः मेरा अध्ययन, अर्जन और उपार्जन तीनों ही 'विद्युत की मातृछाया' व सुखद आश्रय में रहा। यह विद्युत के भौतिक स्वरूप का सानिध्य भी था। इसी विद्युत के संरक्षण और पोषण में मैं और मेरा परिवार अभी भी चल रहा है। पहले वेतन और फिर पेन्शन के रूप में यह अभी भी जीवन का आधार है। इसकी कृपा हमारी स्नायुओं में बसी है और शिराओं में बह रही है। इस पुस्तक के नामकरण में 'विद्युत' शब्द
का समावेश होना उसके प्रति हमारी और हमारे परिवार की ओर से आभार प्रकट करना तथा कृतज्ञता ज्ञापित करना है। अगर में यह कहूँ कि हमने विद्युत को भरपूर ढंग से जिया है तो अत्युक्ति नहीं होगी। विद्युत एक जीवनदायिनी प्रकाशमान लता के रूप में हमारे चारों ओर लिपटी हुई है।
विद्युत
का आध्यात्मिक आधार -
विद्युत
के आध्यात्मिक स्वरूप का विवरण बृहदारण्यक उपनिषद् अध्याय ३ सातवाँ ब्राह्मण: में आता है - 'विद्युत ब्रेह्मेति'।
विद्युत् ब्रह्म इत् आहुः; विदानाद विद्युत्, विद्यात्य एनं पाप्मनः, या एवं वेद, विद्युत् ब्रह्मेति, विद्युत् ह्य एव ब्रह्म।
बिजली
की चमक जो बादलों के माध्यम से तब प्रकट होती है जब बादलों में गड़गड़ाहट होती है। बिजली की इस चमक में हम प्रकृति की सुन्दरता को देख सकते हैं। इस प्रकृति की सुंदरता को भी हमें ईश्वर की सुंदरता का प्रतिनिधित्व करने वाला मानना चाहिये। कोई व्यक्ति बिजली की चमक को एक वस्तु के रूप में देखता है। बिजली की चमक बादल के अंधेरे को भेद देती है, वैसे ही चेतना की चमक हमारे अन्तःकरण के अंधेरे को भेद देती है।
विदानाद
विद्युत: बिजली रात के अंधेरे में भी सूर्य की अनुपस्थिति के बावजूद अपनी चमक से अंधकार को दूर कर देती है। उसी प्रकार हमारी चेतना की चमक से हम प्रकृति का सौंदर्य और फिर अपनी चेतना ही से परोक्ष में परमात्मा का सौन्दर्य अनुभव कर सकते हैं।
वस्तुतः
नारी अथवा प्रकृति को विद्युत की लता के आलोक में देखा जाना प्रकृति के बाह्य सौंदर्य को देखना है। इसी से सृजन कर्ता अर्थात् परमात्मा के सौन्दर्य का दर्शन ही सृष्टि की समग्रता है। जब यह फ्लैश हमारे मन के अन्दर होता है तो हम भीतर-बाहर से चेतना से ऊर्जित हो जाते हैं। पुस्तक के मुखपृष्ठ पर अंकित प्रकृति रूपी नारी के सौन्दर्य को विद्युतीय लता द्वारा प्रकाशित किया जाना इसी का प्रतीक है।
विद्युत
का लौकिक, व्यावहारिक और नैसर्गिक स्वरूप –
अपने
चारों ओर बिखरी-सिमटी संवेदनाओं तथा प्रेम और प्रकृति के स्पन्दन हृदय में बिजली की लहर जैसा उत्प्रेरण करते हैं। ये स्पन्दन ही यहाँ संकलित हैं।
जैसे
विद्युत का उक्त भौतिक, आन्तरिक और आध्यात्मिक स्वरूप तथा उसका जीवन मूल्यों पर प्रभाव वर्णित है। उसी प्रकार इस गीतात्मक कविता संग्रह में तात्विक रूप से परमात्मा का वैभव, प्रकृति का स्वाभाविक सौंदर्य और जन जन के अवचेतन में व्याप्त सुख-दुःख, प्रेम-विरह, राग-अनुराग की रसानुभूति के सूक्ष्मावलोकन करने का प्रयास है।
आशा
है आप जैसे अनुरागी प्रिय पाठकों को यह प्रयास पसन्द आवेगा और कृति को आपका आशीष प्राप्त होगा।
रामनारायण सोनी

आत्मीय
बंधु/ भगिनी,
हर्ष के
साथ अवगत कराने में आता है कि रामनारायण जी सोनी के 75 गीतों का नव संग्रह तैयार है। सद्य प्रकाश्य कृति अपने प्रकाशन के अंतिम चरण में है। आप से यह ज्ञात हुआ कि बहु प्रतीक्षित यह कृति
अब छप कर हम सबके हाथों में आने वाली है तो मन की प्रसन्नता कई गुना बढ़ गई।
श्री
रामनारायण सोनी जी की शिक्षा - बी.ई. इलेक्ट्रिकलसे हुई।
उनके
लेखन कर्म में प्रकाशित पुस्तकें :- गद्य, कविता, गीत, आलोचना आदि विधाओं में लेखन के अतिरिक्त उन्होंने अनेक पुस्तकों का संपादन और अनुवाद भी किया है।
उन्हें
"तुलसी अलंकरण", "साहित्य मनीषि"
आदि सम्मान भी प्राप्त हुए हैं।
एक
लंबे समय से आप लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति भी अप्रतिम बन पड़ी है इसमें कोई संशय नहीं। आपके लेखन के विषय चयन और प्रस्तुतियां पाठकों को लुभाएंगी।
स्वाभाविक रूप से इन दिनों लेखकों की मुख्य शिकायत यही है कि उन्हें सहज रूप से अच्छे पाठक नहीं मिल पाते। आपकी यह कृति संभवतः इस शिकायत को दूर करने में सक्षम सिद्ध होगी।
मैं
आपके नवीन प्रकाशित ग्रंथ के लिए हृदय से शुभकामनाएं व्यक्त करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह आपकी लेखनी को खूब सक्षम बनाएँ ताकि आप वर्षानुवर्ष तक लेखन धर्म में प्रवृत्त रह सकें।
पुनः बधाई
और शुभकामनाओं सहित ...
सदैव सा

डॉ विकास
दवे
निदेशक, साहित्य
अकादमी,
मध्यप्रदेश शासन,
भोपाल
विद्युल्लता - कविता संग्रह - रामनारायण सोनी
विद्युल्लता श्री रामनारायण सोनी जी का कविता संग्रह, अनुभूतियों का महासागर, अभिव्यक्तियों का गहन आकाश और संभावनाओं की उर्वर धरा है।
ऋग्वेद से लेकर सभी वेदों, उपनिषदों, भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, कबीर, मीरा और महादेवी का जीवन दर्शन कवि की स्व अनुभूतियों में तदाकार होकर रत्नाकर और रत्नगर्भा के बहुमूल्य रत्नों में गुँथा शोभनीय आभरण बन गया है। भिन्न-भिन्न कविताओं में विविध अनुभूतियों को अनुस्यूत करने में कवि के कलापक्षीय कौशल और निश्चित दर्शन के साथ विचारों की अखंडता भावपक्षीय परिपक्वता दिखाई देती है। कबीर ने भी अपने खंड-खंड विचारों को कहा और श्रृंखला बनती गई। समाज सुधार, उदात्त प्रेम, उदात्त विरह, गुरु महिमा और ईश्वर से साक्षात्कार के लक्ष्य तक पहुंचने वाले कबीर कभी विश्रृङ्खलित हुए ही नहीं। पवित्रता और प्रेम की अंतर्धाराएँ उनमें सतत प्रवाहित थी।
इस संग्रह में "तुम वरेण्य हो"
से आरंभ कर "चल रे जीवन
उछल-उछल तक आर्ष सहित आगम-निगम का सार तत्व, गुरु महिमा, प्रकृति की पूजा, धरा की गंभीरता, सागर की गहराई, गगन की नि:सीमता, भौतिक स्नेहानन्द और भौतिक कष्टों की अनुभूतियों को कवि ने सहेजा और पाठकों के सामने लीलाओं की सी लावण्यता के साथ बिखेर कर रख दिया।
लगभग सभी रचनाओं की विचारधारा का सारतत्व संग्रह की प्रथम कविता "तुम वरेण्य हो"
में खोजा जा सकता है। एक तरह से यह प्रथम कविता इस संग्रह का 'बीज' है।
इस कविता में एक भी पंक्ति अवांछनीय नहीं है। सभी उदाहरण देना सम्भव नहीं है तथापि एक पंक्ति का उदाहरण प्रस्तुत है -
“तुम ज्ञानमयी
विज्ञानमयी विद्या के प्रवर प्रदाता हो।
तुम में सब है, सब में तुम हो।
हो बाहर भी तुम, तुम ही उर में"
"ईशावास्यमिदं सर्वं यद् किंचित्जगत्यां जगत्।"
ईश्वर
की याद आने पर नयनों का अश्रु से भींग जाना आश्चर्यजनक है। किसी प्रसंग को पढ़कर सुनकर यह देखकर तद्रूप की अनुभूति से हम रो सकते हैं किंतु ईश्वर की याद में रोना अनुभूति की नवीनता है।
ज्ञानहीन दृष्टि और दृष्टिहीन काया के संताप से मुक्ति एक योग्य गुरु द्वारा ही संभव है। "राम का नाम
आधार है” शीर्षक
वाले दो मुक्तकों में एक नवीन प्रयोग दिखा। कहीं एक भजन सुना था - 'जननी बिन
पालन कौन करे, माता बिना आदर कौन करे।' माँ बालक की त्राता है और पालक भी किंतु कष्ट कंटकों से बचाव के लिए - 'कौन सहाय
करें बिन पनही' पंक्ति में पनही का प्रयोग लीक से हटकर है। जिस संदर्भ में पनही का उपयोग प्रयोग हुआ है, उसे पढ़कर लगता है कि कभी पूरी तरह से अद्वैत में भीगे हुए हैं।
कवि ने प्रकृति और उसके उपादानों को परमात्मा का ही विराट रूप माना है। कविताओं में सौंदर्य के असीम भंडार दिखाई देते हैं। एक कविता 'हे अंशुमान' में सूर्य के स्वरूप का दिव्य वन्दन पढ़कर इसे आधुनिक ऋचा कहने में गौरव की अनुभूति होती है। इस चतुष्पदी की दो पंक्तियाँ ध्यानाकर्षण के लिए पर्याप्त है -
"आह्लादित
उषा उद्यत है, करने को अभिषेक तुम्हारा शीतल मन्द पवन ने बह कर सारा आगम पंथ बुहारा।”
यहां 'आगम' शब्द
का प्रयोग भी उल्लेखनीय है। आगम का एक अर्थ होता है वेद वाणी और दूसरा जहाँ आपका आगमन हो रहा है। 'आगम' का
श्लेष चित्ताकर्षक है। मंद पवन राह को स्वच्छ कर मार्ग को प्रशस्त कर रही है और आगम अर्थात वेद वाणी भी सूर्य के तेज से ही तेजस्वी हो रही है। सौरमंडल और वायुमंडल की युति परस्पर आश्रित है, इस वैज्ञानिक सत्य को इस कविता में कलात्मक रूप प्राप्त हुआ है।
प्रकृति के अन्य उपादान वर्षा, पतझड़, बसंत (ग्रीष्म या शरद नहीं) को जीवन से जोड़कर देखने में कवि के अद्वैत, ईश्वर की सर्वव्यापकता, विश्वरूपता और उसका एकाकीपन आदि के अध्ययन जन्य ज्ञान और अनुभव के दर्शन होते हैं। कवि वर्षा की जल बिंदुओं को मन को भिगोने में मानते हैं, अतः छतरी का प्रयोग निरर्थक है। वर्षा होने से बहते पनालों की आवाज में जीवन संगीत और बूँदों की टप टप में भ्रमरों का गुन्जन खोजने वाली कवि की दृष्टि इन उपादानों में ईश्वर को आरोपित कर रूपकों की सुन्दर सृष्टि कर रहे हैं। प्रकृति का मानवीकरण अत्यन्त सुखद है।
कवि
वर्षा और बसन्त के पलों को भरपूर जीने की सलाह देते हैं। क्योंकि इस क्षणभंगुर जीवन में सुख के अवसर कम होते हैं। प्रसाद जी ने भी कहा है - 'सुख चपला
सा दु:ख घन में' यहाँ कवि एक दार्शनिक की तरह चिन्तन करते दिखाई देते हैं। मानवीकरण की उदात्तता हमें आकर्षित करती है -
लोचनों में प्रीत भरकर, मैं खड़ा हूँ देख प्रियवर, क्षितिज तक फैली भुजाएँ कण्ठ का मधुभार लेकर।'
यहाँ प्रियवर शब्द की ओर देखिए - क्षितिज तक फैली भुजाएँ तो विराट पुरुष की ही हो सकती है तो 'प्रियतम' कौन? कैसा
होगा? मुझे ऐसा लगता है कि कवि यहाँ अद्वैत से मुक्त होना चाह रहे हैं क्योंकि अद्वैत सरसता में बाधक होता है। प्रियवर से प्रियतम के बीच की दूरी में जो तड़पन है वही भक्ति का आधार है। भक्त में दैन्यता आवश्यक है। बाबा तुलसी कहते हैं - "तू दयाल, दीन
हौं, तू दानी हौं भिखारी।
हौं प्रसिद्ध पातकी तू पाप पुंज हारी।।" में तुलसी की
दैन्यता साकार हुई है। श्रीमद्भागवत और भक्तिकालीन कवि सूर मीरा रविदास में भी अद्वैत को प्रियतम की प्राप्ति में बाधक माना है।
निराकार उपासक कबीर भी "दुलहिन गावहुँ मंगलचार, हमारे घर आए राम अवतार" कह कर कहीं
ना कहीं अद्वैत्ता से उपराम होना चाहते हैं, तो कभी यदि प्रियवर से प्रियतम तक की दूरी तय करना चाहते हैं। स्वयं को अकिंचन बनाना चाहते हैं तो यह साधना का अंतिम साध्य ही है।
बसन्त के चित्रों में प्रकृति का श्रृंगार, जग के विरोधाभास, कर्म की गति और जीवन की नश्वरता को पढ़ कर कवि के चिन्तन की विविधता समझी जा सकती है।
'आज नियति
ने घुमा चक्र, फिर से नव संसृति रच डाली' में गीता का कर्म योग है तो 'धरा धाम
में जो पाया है, धरा यहाँ रह जाना है' में दर्शनिकता को सुंदर यमक से उकेरा गया है। कवि प्रकृति को ही परमात्मा का मंदिर मानते हैं।
“मैं प्रणाम
करता हूँ इन, हिम आच्छादित शिखरों को
कण-कण इस भूतल का, मेरे प्रभु का यह मंदिर है।”
कवि कभी अतीत को भूलने की सलाह देते हैं, तो कभी शुष्क होते मानव हृदय से उत्पन्न होने वाली विभीषिकाओं की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित करते हैं।
कवि की दार्शनिक दृष्टि कई नई-नई धाराओं में बह रही है। 'चरण दिए
चलने को फिर क्यों भर डाले इनमें छाले' में आदमी निकटता को व्यक्त करने वाले उलाहने हैं तो नेपथ्य में देखने की चाह महादेवी जी की याद दिलाती है - लो उसी इतिहास की खुलती परत को देखते हैं। महादेवी जी प्रकारान्तर में यही बात यूँ कहती है - तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है? जा रहे जिस पन्थ में युगकल्प उसका छोर क्या है?
कई कविताओं में दीपक के रूपक कई - कई रूपों में हमारे सामने है-
अन्धकार से लड़ने वाले, आले के सब दीप बुझे हैं
प्रात किरण से रो-रो कर, फिर से जीवन मांग रही है' में करुणा की अभिव्यक्ति है।
दो दीपक के माध्यम से भाग्य की विडंबना का चित्रण, यह कविता भाग्यवाद पर कवि के विचार के साथ व्यवस्था पर भी व्यंग्य है -
'जब गढ़ा
था तन हमारा, एक से थे तेल बाती।
एक सी ही ज्योति वह थी, जो हमें आकर जलाती।
नाम भी तो एक ही है, पर मुझे आला मिला है
पर तुझी से अप्सराएँ, थालियाँ अपनी सजाती।।'
दीपक भी परपीड़ा की अनुभूति करते हैं, दूसरों के लिए जीने वालों में भी यही पीड़ा होती है। अनुभूति का दार्शनिक रूप भी पठनीय है -
'परवाना जब
भी जलता है मुझमें
बुझूँगा और जलूँगा कई बार मैं तो
इसे जिन्दगी तो ना मिलेगी फिर से
इन्दौर के रहने वाले कवि श्री सोनी जी में इन्दौर के प्रति ममत्व के भाव की भी उदात्तता से व्यक्त हुए हैं। गॉंवों से जुदा होने की पीड़ा, उनके बदलते स्वरूप पर चिंता, गांव के बच्चों का अल्हड़पन, अल्हड़पन को व्यक्त करती भाषा और उसके देशज शब्द जैसे - 'पुक-पुक', गजकुंडी, 'चंग - पो', 'लँगडी', 'गधा
मार को टप्पो', हिंगुली
जैसी मोहित करती शब्दावली मिट्टी से उनके जुड़े होने का विश्वास दिलाती है।
प्रेम में पलों का आदान-प्रदान, प्रिय की प्रतीक्षा, प्रिय की अनुपस्थिति से नि:सार होता है यह दृश्य जगत, स्वयं को परखने के लिए आईने का रूपक एक असंभव में संभानावना के संदेश, विज्ञान-जनित और विकास महाविध्वंसकारी गतिविधियों के बीच हन्सा रूपी जीव को पुनः उसको उत्स की ओर ले जाने का आह्वान, प्रकृति की अमूल्य और अद्भुत अवदान के बीच मानव शक्ति की व्यर्थता और स्वच्छता प्रेम की अमरता, जिंदगी के उतार-चढ़ाव अतीत की स्मृतियों पर व्यंग्य, स्नेह में समर्पण और द्वैतता की समाप्ति का महत्व, स्नेह की राह पर हुए हादसों का प्रतीकात्मक विवरण, ईश्वरीय प्रेम के अभाव में भौतिक सुखों की व्यर्थता, कष्ट-कंटकों में जीवन के समान खिलाने वाले गुदड़ी के लाल महापुरुषों के माध्यम से आशा का संदेश, पर - पीड़ा और आत्म पीड़ा का साहित्य से संबंध, पीड़ा का मानवीकरण और उनके रूपक, कोरोना महामारी की विभीषिका, कोरोना काल में अन्दर की चीत्कार और बाहरी सन्नाटा आदि से मुक्ति के लिए अतीत को भूलने का आग्रह, मृत्यु पर विलाप, जीव के अनन्त में विलीन होने को प्रतिकों के माध्यम से जिस तरह व्यक्त किया गया है, उन्हें शब्दाकार दिया है। यह शब्दाकार ही शब्दाकाश है। ब्रह्म की तरह व्यापक और सुनियोजित। धारा या स्वर, रुदन या आनन्द, कहीं भी कोई कवि की वाग्धारा और भावधार विखंडित नहीं हुई है।
संग्रह की किसी कविता पर वेदों का, किसी पर उपनिषदों का, तो किसी पर महापुरुषों का प्रभाव व्यंजित है। एक कविता 'गर मैं
पागल होता, तो बस तू होता या मैं होता' में श्रीमद्भागवत के अवधूत भरत और राजा रघुवण के संवाद की छाया परिलक्षित होती है। यहाँ मानो कवि ने भरत के चरित्र को स्वयं में आरोपित कर भक्ति, समर्पण और परमात्मा के दर्शन की लालसा को व्यग्रता से व्यक्त किया है। ब्रह्म की सर्वव्यापकता का चित्रण - "सृष्टि स्थिति विनाशानां, है कार्य-कारण वह सभी।" कह कर काल
पुरुष के तीनों रूप को एकसार रखने वाला निरूपित किया है। तुलसी ने इसे इस तरह नमन किया है - उद्भव, स्थित, संहारकारिणीं, क्लेशहारिणीं, सर्व श्रेयस्करी सीतां नतोsहं राम वल्लभाम्।
ध्वन्यात्मकता और विरोधाभासों ने संग्रह को रोचक बना दिया है।
"तड़ित
मजीरा मेघ गर्जना
घनन घनन घन करता गान" है या
"तार
वीणा के जगाने
मधुमीत तुन-तुन कर रहा है
गीत गुनगुन कर रहा है
सर्वत्र मनोविज्ञान का प्रभाव कविताओं को प्रभावी और प्रामाणिक बना रहा है।
इस प्रकार 'विद्युल्लता' कविता
संग्रह कवि श्री सोनी जी की अनुभूतियों का वह कोष है जिसमें अध्यात्म, दर्शन, मनोविज्ञान, क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा की सालंकारिक नदियाँ प्रवाहित हैं।
संग्रह का शीर्षक 'विद्युल्लता' भी
कौतुहल जगाता है। आकाशीय विद्युत चंचला भी होती है और अल्पजीवी भी। तो क्या कवि जीवन की क्षणभंगुरता की ओर संकेत करना चाहते हैं?
या विद्युल्लता पर खिले उन प्रकाश पुष्पों की कौंध पर जो आँखों से होकर सीधे मन में उतरती है। उस कौंध से दृष्टि प्रकाश से भर जाती है और हृदय भी; जो भी हो शीर्षक का चयन कवि का अपना अधिकार है।
इस संग्रह में भावपक्ष और कलापक्ष; कथ्य और शिल्प की दृष्टि से समृद्ध है। रचनाओं का प्रवाह और प्रभाव रसानुभूति के साथ बाह्य दृष्टि और अन्तर की शक्ति से परिचय करवाता है। यह नितान्त सत्य है कि संग्रह की हर एक कविता एक-एक शोध पत्र की क्षमता रखती है।
यह समीक्षा सीमा से बँधी है अतः मेरा मन थोड़ा खिन्न है। काश! मैं इस संग्रह की रचनाओं के साथ-साथ कवि के मन में बसे उन काव्य संस्कारों को भी पढ़ पाती जिसमें कविता के अंकुर जन्म लेते हैं।
अन्त में इस संग्रह की कविताओं के माध्यम से कवि श्री रामनारायण सोनी जी के विराट व्यक्तित्व और कृतित्व की जो छबि मेरे मन में बनी है उसे सादर को सश्रद्ध नमन करते हुए यह लघु समीक्षा पाठकों को सादर समर्पित है। इत्यलम्।
डॉ. जया पाठक
पूर्व प्राध्यापक (हिंदी)
उच्च शिक्षा भोपाल (मध्य प्रदेश)
जानकी मंगल भगत सिंह मार्ग
थांदला - जिला झाबुआ
मध्य प्रदेश 45777
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य तुमने करुणा को जन्म दिया
श्री
रामनारायण सोनी जी वर्तमान समय में मध्य क्षेत्र में हिंदी साहित्य के मूर्धन्य सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी लेखनी, पृष्ठों से बाहर निकल कर अपनी परिमित सीमाओं को अपरिमित कर देती हैं। इस अपरिमित सीमांकन से यह लेखनी, नभ की ऊंचाई में भी उतनी ही सुदृढ़ दिखाई देती है, जितनी भूमि के सानिध्य में अकाट्य रूप से जकड़ी हुई, अपने स्थान पर अचल अडिग अविनाशी स्वरूप के बोध को जीवंत रखती है। यह भूमि की गहराई से न केवल अपने सत्व को ग्रहण करती है अपितु उसकी वांछनाओं का प्राप्ति फल, सामाजिक विन्यास में विसरित भी करती है, जो एक साहित्यकार का निज सामाजिक धर्म भी है।
एक
साहित्यकार का चिन्तन सर्वदा उच्चकोटि का ऊर्ध्वगामी चिन्तन होता है किन्तु उसका बहाव फिर भी यथार्थ की भूमि को स्पर्श करने को हर क्षण
आतुर खड़ा रहता है। इसीलिए यदि विषय संदर्भ में किसी रचना में कल्पना का कोई बिम्ब लेखनी में उतर भी आया हो, तो वह बिम्ब ठोस संकल्पनाओं के ताने से पूर्व एवं पूर्ण रूप से पोषित ही माना जाना चाहिए, यह मेरा निजी विमर्श है ! क्योंकि धर्म, अध्यात्म एवं दर्शन के इस संयुक्त सहचालन में कोई भी वर्गीकरण, चाह कर भी वर्गीकृत किया जाना किसी भी समीक्षा में संभव ही नहीं है ।
प्रस्तुत संग्रह पाठकों के हाथों में शब्द आराधन की जीवित संजीवनी है, जिसमें काल के ललाट पर शब्दों की अमिट एवं सुन्दर व्याख्या निहित की गई है। इसके शीर्षक चयन ने जब अपना आकार लिया था, वह दिवस भी आज ही की भांति अनिर्णय से भरा हुआ था कि इस संग्रह की विविधताओं में, विषय धर्मिता की इस विराट अवस्था में शीर्षक का चयन आखिर कैसे किया जाए ?? किंतु श्रेष्ठता छन कर ऊपर आती ही है।
"सिलवटों
के पार से कुछ अनसुनी बातें सुनाऊँ
दर्द
ने लिक्खे कसैले घाव आओ मैं दिखाऊँ"
वैसे
भी श्री सोनी का लेखन विशुद्ध उपनिषदीय सूक्ष्म
तत्वों का ग्राह्य एवम उदात्त प्रकटीकरण है। यह एक ऐसा विषय है जिसमें जीवन के भिन्न-भिन्न तत्व, प्राणधारा के रूप में संचित है। वह पतझर में पत्तों के गिरने के अनुक्रम को वासन्ति वेला में नवांकुरण की प्रक्रिया परिलक्षित कराता है, तो दीपक के प्रकाश की फैलती हुई टिमटिमाती लौ की तमस को चीरती हुई साधना में, उसके एकान्त के गीत का साहचर्य
होने में भी स्वयं को हर घड़ी उसके साथ ही पाता है। ऐसा साथ क्या कभी आपने देखा??अनुभूत किया??
दीपक
गीत को यदि समझना है तो दीपक का सानिध्य प्राप्त करना आवश्यक है। तंत्र, मंत्र हों अथवा आराध्य की साधना! दीपक के बिन तो सभी निष्प्राण है!
"तू कौन है
तलाश कर, खुदी में खुद तलाश कर"
चला
गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।"
सूर्य
की प्रदीप्त अर्च्छना के विन्यास में दिवाकर अपनी प्रचंड ऊष्मा से जगती में प्राण भरता है, तो मन के किसलय आंगन में अबोध मन की अनुशंगिनी होकर, बहने वाली निर्झरिणी के उत्तफुल्ल प्रयाण एवं सागर में विलय की अपनी धर्मिता का एक अलग ही चेतन राग है। इसमें एकल प्रवासरत नदी की निर्मल धारा के अनगिनत गीत घुमड़ कर प्रस्फुटित होते हैं। वह नदी कभी अकेली होकर विरह का गान करती है, तो कभी वह पनघट पर अठखेलियां करती नवयौवनाओं के सानिध्य की कैली सखी है। वह नदी कभी एक विशुद्ध शास्त्रीय गायन परम्परा की अनुचर है तो कभी कभी विशिका के निर्लिप्त छने हुए कणों में, बूंदों में ठहरी परिलक्षित होती है। भले ही रेत में सिमट जावे पर नाम नदी का बदलता नहीं है।
फिर
कभी कवि की यात्रा जब जड़ से चैतन्य की यात्रा में विलय करती है तो दृश्य कुछ अचानक ऐसा लगता है_
"इस मुखौटे के
परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल
दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।"
यह
यथार्थ में उलझे हुए दर्पण की मौन अभिव्यक्ति का स्वर है जो अनहद के उस पार है ।
जैसे
"मेरे साजन हैं
उस पार मैं, इस पार, अबकी बार, ले चल पार! ...
ओ
मेरे माझी अबकी बार!!"
एक
साहित्यकार की अपनी चेतन यात्रा, उसका नदी रूप में रूपांतरण ही समझा जा सकता है क्योंकि बहना और गति दोनों समान रूप से अवस्थित हैं ।
दोनों
संज्ञा हैं किन्तु क्रिया पद में आवर्त रूप से परिवर्तन दृष्टि गोचर होता है। क्या यह परिवर्तन संसार का नियम नहीं है ?
प्रस्तुत संग्रह "विद्युल्लता" ऐसे
ही विविध पिचहत्त्तर मनोयोगों में लिपटा हुआ जीवन का स्वसंवाद है।
यह
काव्य संग्रह के रूप में अभिव्यक्त है अवश्य, किंतु वास्तव में यह साहित्यिक चेतना का प्रौढ़ एवम दीर्घ प्रयोजन भी है, जो नितांत दार्शनिक है। समय की दीर्घ यात्रा में जिसने जो पाया, वही तो उकेरा!!
"इस हृदय की
भित्तियों पर जो लिखे कड़वे कथानक"
"खोजता क्यों बावरा
मन दंश की पीड़ा अचानक।"
यह
भाव क्यों न हो ?? जीवन
के मधुवन में नीम की पवन भी तो अपने स्वभाव में
बहता ही है ।
दर्शनिकता का यह क्रोड़ ही
श्री रामनारायण जी सोनी की केंद्रीय वैचारिक प्रबुद्धता का शाब्दिक चित्रण, दर्शन एवं प्रकटीकरण है जिसमें अध्यात्म का दार्शनिक बिम्ब है तो स्व में स्वयं को पाने की महती आकांक्षा भी है !! कहीं प्रकृति के सानिध्य में स्वयं की तलाश है, तो कहीं उपनिषदों के अनसुलझे कथ्य में जीवन की सादगी का अपने शब्दों में चित्रण है !!
लिखने
में बहुत कुछ लिखा जा सकता है किंतु एक कवि जब अल्प शब्द में जीवन के सारांश को एकत्र करने का सघन प्रयास करता है तो 'विध्युल्लता' अपने इस निर्माण में स्वयं अपनी अनुभूति करवाती है। रचना अपने रचयिता का परिचय जब स्वयं देने लगे तो लेखनी का प्रकाश भी फैल ही जाता है।
भाव,
भाषा, कलापक्ष, भावपक्ष, अपनी लाक्षणिक व्यंजनाओं में निखर कर प्रकट है। शब्दिता ने अपना प्रवाह और गति दोनों संतुलित रखी है ।
अपने
लेखन का अभीष्ट उद्देश्य दार्शनिक भी है, प्राकृतिक भी है, आध्यात्मिक भी है, श्लाघनीय भी है तो कोमल भी है।
मन
की शुचिता इसीलिए संभवतः लेखनी की निर्लिप्त अवस्था है ।
आपको कोटिशः
बधाई ।
डॉ. जय
वैरागी
सचिव साहित्य
एवं संस्कृति परिषद वनाञ्चल
जिला झाबुआ
(म.प्र.)
शुभाकांक्षा
कविता
न्यूनतम शब्दों में अधिकतम की अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ संसाधन होती है । कविता मन को एक साथ ही हुलास , उजास और सुकून देती है । नौकरी और साहित्य के मेरे समान धर्मी श्री रामनारायण सोनी के कविता संग्रह विद्युल्लता को पढ़ने का सुअवसर मिला । संग्रह में भक्ति काव्य की निर्मल रसधार का अविरल प्रवाह करती समय समय पर रची गई सत्तर कवितायें संग्रहित हैं । सभी रचनायें भाव प्रवण हैं । काव्य सौष्ठव परिपक्व है । सोनी जी के पास भाव अभिव्यक्ति के लिये पर्याप्त शब्द सामर्थ्य है । वे विधा में पारंगत भी हैं । उनकी अनेक पुस्तकें पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं , जिन्हें हिन्दी जगत ने सराहा है । सेवानिवृति के उपरांत अनुभव तथा उम्र की वरिष्ठता के साथ रामनारायण जी के आध्यात्मिक लेखन में निरंतर गति दिखती है । कवितायें बताती हैं कि कवि का व्यापक अध्ययन है , उन्हें छपास या अभिव्यक्ति का उतावलापन कतई नहीं है । वे गंभीर रचनाकर्मी हैं ।
सारी
कवितायें पढ़ने के बाद मेरा अभिमत है कि शिल्प और भाव , साहित्यिक सौंदर्य-बोध , प्रयोगों मे किंचित नवीनता , अनुभूतियों के चित्रण , संवेदनशीलता और बिम्ब के प्रयोगों से सोनी जी ने विद्युल्लता को कविता के अनेक संग्रहों में विशिष्ट बनाया है । आत्म
संतोष और मानसिक शांति के लिये लिखी गई ये रचनायें आम पाठको के लिये भी आनंद दायी हैं । जीवन की व्याख्या को लेकर कई रचनायें अनुभव जन्य हैं । उदाहरण के लिये "नेपथ्य के
उस पार" से उधृत है
... खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं, इन मुखौटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैँ । जैसी सशक्त पंक्तियां पाठक का मन मुग्ध कर देती हैं । ये मेरे तेरे सबके साथ घटित अभिव्यक्ति है ।
संग्रह
से ही दो
पंक्तियां हैं ... " वाणी को तुम
दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है , आज व्यथा को टांग अलगनी गाथा कोई गढ़नी है । " मोहक चित्र बनाते
ये शब्द आत्मीयता का बोध करवाने में सक्षम हैं । रचनायें कवि की दार्शनिक सोच की परिचायक हैं ।
रामनारायण जी पहली ही कविता में लिखते हैं " तुम वरेण्य हो
, हे वंदनीय तुम असीम सुखदाता हो .... सौ पृष्ठीय किताब
की अंतिम रचना
में ॠग्वेद की ॠचा से प्रेरित शाश्वत संदेश मुखर हुआ है । सोनी जी की भाषा में " ए जीवन के
तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल , जलधारा प्राणों की लेकर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल " ।
यह
जीवन प्रवाह उद्देश्य पूर्ण , सार्थक और दिशा बोधमय बना रहे । इन्हीं स्वस्ति कामनाओ के साथ मेरी समस्त शुभाकांक्षा रचना और रचनाकार के संग हैं । मैं चाहूंगा कि पाठक समय निकाल कर इन कविताओ का एकांत में पठन ,मनन , चिंतन करें रचनायें बिल्कुल जटिल नहीं हैं वे अध्येता का दिशा
दर्शन करते हुये आनंदित करती हैं ।
विवेक रंजन
श्रीवास्तव
वरिष्ठ समीक्षक
, कवि और व्यंग्यकार
सेवा निवृत
मुख्य अभियंता
ए २३३
, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , जे के रोड , भोपाल ४६२०२३
भोपाल दिनांक २१ जनवरी २०२४
विद्युल्लता का सतरंगी इन्द्रधनुष
मैं श्री रामनारायण सोनी जी की पुस्तक 'विद्युल्लता'
की पाण्डुलिपि पढ़ रही थी इसमें पचहत्तर कविताएँ संग्रहित हैं। इसमें उन्होंने जीवन, अध्यात्म और कई सामयिक विषयों को करीब से छुआ है। निश्चित रूप से इन कविताओं में दार्शनिक अभिप्राय और जीवन के यथार्थ के दर्शन होते हैं। गीतों की श्रृंखला में "दो घूँट प्यार के ला देना, ऐ जिन्दगी तू कब गले मिली थी, जो मिल गया सम्हाल ले, तू कौन है विचार कर जैसी पंक्तियाँ जीवन की सच्चाई को उद्धाटित करती है।
इस पुस्तक की प्रत्येक कविता बहुत सुन्दर है, इन्हें जरूर जरूर पढ़ियेगा।
शुभकामनाओं सहित
अर्यमा सान्याल
पूर्व एयरपोर्ट डायरेक्टर
नोयडा, (उत्तर प्रदेश)
तुम प्रतिबिम्बित कण कण में
तुम वरेण्य हो, हे वंदनीय! तुम असीम सुख दाता हो
तुम तो मेरे जीवन-धन हो तुम मेरे भाग्य विधाता हो।
तुम चिदानन्द आनन्द विभो! और दुःखों के त्राता हो
तुम ही कर्ता हर्ता सब के और जगत के धाता हो।।
तुम जल थल और समीरण में।
तुम प्रतिबिम्बित कण कण में।।
तुम असीम हो तुम अनन्त तुम हो व्यापक सचराचर में
तुम परमज्योति बन कर रहते हो रवि में और सुधाकर में।
तुम ज्ञानमयी- विज्ञानमयी विद्या के परम प्रदाता हो
तुममें सब है सब में तुम हो बाहर भी तुम,
तुम ही उर में।।
तुम जल थल और समीरण में।
तुम प्रतिबिम्बित कण कण में।।
तुमसे ही मिलता सुख-वैभव नवनिधि प्रवर प्रदाता हो
तुम पावन परमेश्वर ऐसे गुण जिनके जग गाता हो।
निर्बल मन और चित्त हमारा, तुम सब कष्टों के त्राता हो
तुम उदार, उज्ज्वल,
वरेण्य तुम जन जन के मन ज्ञाता हो।।
तुम जल थल और समीरण में।
तुम प्रतिबिम्बित कण कण में।।
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो प्रतिबिम्बित कण कण में
तुम हो जल में थल में नभ में पावक और समीरण में।
तुम ही हो वह कठिन कुलिश,
तुम ही कोमल कुसुम प्रभो
तुम त्रिकाल तुम महाकाल तुम लय में और क्षरण में।।
तुम जल थल और समीरण में।
तुम प्रतिबिम्बित कण कण में।।
vvv
हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!
हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!
मरुथल में हो ढूँढ रहा प्यासा मृग जैसे बूँद बूँद
दिग दिगन्त में फैली है जग की तृष्णा की घनी धुन्ध।
इन्द्रिय के घोड़े थके थके, काँधे आगे को झुके झुके
इस लोभ मोह के चक्कर में, आशा के टूटे सभी बन्ध।।
अब तेरी याद सताती है।
आँखें भींग भींग जाती है।।
इस मन में मैल भरा इतना सागर में खार भरा जितना
इस पाप पुण्य की गठरी में है माल भरा मैंने कितना।
पर सुमर नहीं पाया मैं तीनों पन बीत गये रीते
इस कलुष भरे जीवन को ही मैं रहा पालता इतना।।
अब तेरी याद सताती है।
आँखें भींग भींग जाती है।।
इस हाड़ मांस के पिंजर को सारी ही उम्र सजाया हूँ
रहा बीनता कंकर पत्थर हीरा जनम गवाँया हूँ।
द्वार द्वार और नगर नगर में भटक रहा था मैं अब तक
तुमने उपकार किये इतने मैं समझ अभी पाया हूँ।।
अब तेरी याद सताती है।
आँखें भींग भींग जाती है।।
मन की अन्धी गलियों में तुम रोशन हो कर छा जाओ
अपनी करुणा से हे प्रभु! तुम मेरी झोली भर जाओ।
तम के काले घन ने घेरा है दुःख दर्दों ने डाला डेरा
हे नाथ! तुम्हें ना भूल सकूँ अन्तर में ऐसे रम जाओ।।
अब तेरी याद सताती है।
आँखें भींग भींग जाती है।।
हे प्राण कण्ठ में रुके हुए वाणी अवरुद्ध हुई जाती
कानों तक आई आवाजें फिर वापस लौट कहीं जाती।
पर सिर्फ तेरी पदचाप सुनूँ यही मेरीअभिलाषा है
हे प्रणतपाल! हे दीनबन्धु! मैं हूँ बस तेरा आराती।।
अब तेरी याद सताती है।
आँखें भींग भींग जाती है।।
vvv
जो मिल गया सम्हाल ले
तू कौन है? विचार कर, खुदी में खुद तलाश कर
आज दिन नया मिला,
इसी का तू सिंगार कर।
चुनौतियाँ हजार हों भले,
तू मोर्चा संभाल ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।
जो मिल गया सम्हाल ले।।
जोखिमों का काफिला है जिन्दगी में जान ले
हर कदम पे खेल है, हर खेल को पहचान ले।
खत्म खेल भूल कर तू, फिर नया तू हाथ ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।
जो मिल गया सम्हाल ले।।
रोज क्यों तू मर रहा है, खुद को आज मार दे
बिछड़ गया जो आज में, कल से भी निकाल दे।
जो मिल गया, सहेज ले, बिखर गया बिसार दे
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।
जो मिल गया सम्हाल ले।।
आया है सो जायगा ये, मृत्यु सत्य जान कर
इस धरा पे जो धरा, धरा रहेगा ध्यान कर।
जो अरूप रूह है वो, अमर रहेगी मान ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।
जो मिल गया सम्हाल ले।।
vvv
प्रभु का यह मन्दिर है
मैं प्रणाम करता हूँ इन हिम आच्छादित शिखरों को
वन्दन करता हूँ सूरज की अरुणिम इन किरणों को।
धरता अपना शीश मही पर इसका अर्चन करने को
अभिनन्दन पहुँचे मेरा उन कल कल करते झरनों को।।
कण कण इस भूतल का मेरे प्रभु का यह मन्दिर है
नभ में मण्डित चाँद सितारे मन्दिर के ये शिखर हैं।
कण कण इस भूतल का मेरे प्रभु का यह मन्दिर है
नभ में मण्डित चाँद सितारे मन्दिर के ये शिखर हैं।
तड़ित मजीरा मेघ गर्जना घनन घनन करता घन है
मन मयूर का नर्तन मेरा यह घर आँगन सुन्दर है।।
कण कण इस भूतल का मेरे प्रभु का यह मन्दिर है
नभ में मण्डित चाँद सितारे मन्दिर के ये शिखर हैं।
रोम रोम में बसी चेतना मुझमें तू ही नित रमता है
सूखे पत्तों के परदे में भीषण दावानल छिपता है।
जनम मरण के बीच हमारा जीवन कैसे चलता है
नहीं दीखता फिर भी तो तू संग सदा ही रहता है।।
कण कण इस भूतल का मेरे प्रभु का यह मन्दिर है
नभ में मण्डित चाँद सितारे मन्दिर के ये शिखर हैं।
vvv
राम को नाम अधार है
प्रीत गयी सब रीत गई गये सारे ठाठ ठठेरन के
सब तात गये मन मीत गये टूटे सपन सबेरन के
ठठरी का है छूटा ठौर कहीं न नाते रहे ममेरन के
थक हार गिरे कछु धाय चले बंजारे लोग बसेरन के
नाम गया अरु धाम गया राउर रंक मिले एहि घाटे
छैल छबीली ओ जोगी जती अन्त मिलै सबै एहि बाटे
कौन सहाय करै बिना पनही राह बिछे काँटे ही काँटे
राम को नाम है एक अधार सबही भव बंधन काटे
vvv
जय जय हे गुरुदेव!
तुम क्षितिज के पार से वो युक्ति कोई ढूँढ लाओ
केंचुली में मैं बँधा हूँ आ इसे तुम खोल जाओ।
जो वचन तुमने दिया था हाथ मस्तक पर छुआ था
मैं घिरा अवसाद से हूँ कर कृपा गुरूदेव आओ।।
अन्ध उर में घोर रजनी दण्ड ले कर आ खड़ी है
पाश है जकड़े हुए भवबन्ध की बाधा बड़ी है।
व्यर्थना से उम्र भर ये झोलियाँ मैनें भरी है
पार तुम उतरावगे भवसिन्धु से, आशा बड़ी है।।
मैं तृणों की नोक सा हूँ तुम गहन आकाश से हो
मैं अकिंचन,
मैं प्रवासी, मुक्ति के तुम द्वार से हो।
तुम अभय के हो प्रदाता, सीस चरणों में नवाऊँ
तुम प्रथम,
अन्तिम तुम्हीं इस दीन के विश्वास से हो।।
vvv
फिर माटी माटी में धर दी
तुमने नयन दिये जग देखूँ पर आँसू उसमें रच डाले
देख सकूँ सच को सच सा फिर सम्मोहन क्यूँ भर डाले।
दे दी प्यास अगर मुझको यह फिर मरीचिका क्यूँ दे दी
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इनमें छाले।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इनमें छाले।।
किसके जीवन करूँ हवाले ?
स्वीकारे अभिषाप नियति के सब तेरे वरदान समझ कर
पग पग पर क्यूँ भरे छलावे व्याकुल हूँ आकण्ठ उलझ कर।
अधरों को वरदान दिया वे मुखड़े पर मुस्कान बिखेरें
फिर क्यों पीना पड़ता इनको कालकूट के प्याल भर भर।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
किसके जीवन करूँ हवाले ?
साँस रची जीवन जीने को तो क्यों फिर उसांसें भर दी
बल का कर आधान करों में पाप पुण्य सिर गठरी धर दी।
क्यों माटी को रौंद रहे तुम खेल खेल में बारी बारी
पहले जीवन माटी में भर, फिर माटी माटी में धर दी।।
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
किसके जीवन करूँ हवाले ?
सागर के इस छोर खड़ा मैं भरी सुनामी सागर में
जर्जर तरणी अपनी ले कर कैसे उतरूँ सागर में
सागर तू है सागर तेरा और सुनामी भी तो तेरी
कौन उबारे मुझे उफनते और विकट भवसागर में
चरण दिये चलने को फिर क्यूँ भर डाले इन में छाले।।
किसके जीवन करूँ हवाले ?
vvv
हे अंशुमान !
भूधर के सुन्दर ललाट पर हिंगुल सी बिखरा रोली
पुष्पों की उघरी पलकों पर शलभों की आई टोली
सूरज के स्वागत में उषा स्वर्णमाल लेकर बोली
उतरो तुम हे ज्योतिमान! जग का कण तुम्हें बुलाता
जीवन के भी तुम हो जीवन,
हो तुम भाग्य विधाता
जीवन के भी तुम हो जीवन,
हो तुम भाग्य विधाता
आह्लादित उषा उद्यत है करने को अभिषेक तुम्हारा
शीतल मन्द पवन ने बह कर सारा आगम पंथ बुहारा
अरुण अश्व पर आरोहित हो कण कण में उत्साह भरो
बरसे कृपा तुम्हारी सब पर तन मन में व्यापे उजियारा
जीवन के भी तुम हो जीवन,
हो तुम भाग्य विधाता
हे अंशुमान,
हे दिव्य ज्ञान हे, हो जग के तुम महाप्राण
हे पाप विमोचक, कष्ट निवारक तुमसे ही जग दृष्यमान
तुम से ही ऋतुएँ जन्मे और तुम से ही मधुमास झरे
हे प्रणतपाल अनुकम्पा कर स्वीकारो मेरा अर्घ्यदान
जीवन के भी तुम हो जीवन,
हो तुम भाग्य विधाता
तुम ओजस तेजस के दाता, त्याग,
तपस्या के प्रमाण
दुःख दरिद्र के तुम हो हर्ता,
चेतनता का तुम विधान
निखिल सृष्टि के पालक धारक तेजपुञ्ज वो तिमिर हरण
मैं प्रणत भाव से करता हूँ स्वीकारो हे देव नमन
जीवन के भी तुम हो जीवन,
हो तुम भाग्य विधाता
vvv
पीत पात झड़ते हैं
अभी अभी बीता है पतझड़
है कुछ मौन अभी बाकी
झरे गिरे से उन पातों की
अभी काल ने यादें ढाँकी
जो जगह पुराने पातों ने
पतझारों में कर दी खाली
आज नियति ने घुमा चक्र
फिर से नव संसृति रच डाली
पल्लव अपना जीवन लेकर
शाखों पर जब उतरे थे
अपनी करनी के बलबूते
कुछ बिखरे कुछ निखरे थे
पादप के इक इक हिस्से को
अपना धर्म निभाना है
धरा धाम से जो जो पाया
धरा यहाँ रह जाना है
जब कोंपल शाखों में जन्मी
मधुमास बड़ा बौराया था
पीपल ने थी पीटी ताली
झरनों ने मङ्गल गाया था
उत्स हुआ बन का आंगन
भ्रमरों ने वीथी घूम घूम
देखा पुष्पों को चुपके से
कलिका का माथा चूम चूम
उस पादप का रोआँ रोआँ
था कितना रोमांच भरा
मूलों ने भेजा अभिसिंचन
था फूलों से मकरंद झरा
उन शाखों से लिपटी लिपटी
मृदु लतिका ने स्पर्श किया
अंकुर का नव अरुणाई से
फिर हौले से श्रृंगार किया
रजनी की शीतल अलकाएँ
शबनम की माला ले आई
फर फर करती चिरिया भी
फुनगी पर बैठी मुस्काई
अमलतास की वेणी लटकी
केकी करती वृन्दगान
अमरबेल ले पीत वसन
बुन बुन कर ताना है वितान
जीवन के चक्र निराले हैं
कण कण है गतिमान यहाँ
बंजारे की बस्ती ठहरी
है आज यहाँ तो कल वहाँ
जब से यह धरती जन्मी है
काल बली कुछ रचता है
रोज बनाता रोज मिटाता
काल कभी ना मरता है
झर जाऊँगा मैं डाली से
जैसे झरते हैं पीत पात
इससे पहले भी आए हैं
कितने ढलते सांझ प्रात
पर सब के सब वे थे अपने
कर्मों धर्मों से बँधे बँधे
नियति परिधि में नियमों की
निरत रहे सब सधे सधे
फिर जीवन की संध्या आई
घूमा था जब वह कालचक्र
श्वासों की माला टूट चली
थी दृष्टि काल की महावक्र
झरते पातों की तब खुद ही
शाखों से ममता छूट गई
वह साँझ रात की गोदी में
झीनी गागर सी टूट गई
आया पवन झकोरा तब वह
आँगन आँगन दिया बुहार
नियती नटी है कब चुप बैठी
फिर फिर उसने किया सिंगार
vvv
नेपथ्य के उस पार
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं
इन मुखोटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैं
रो रहा था जो वहाँ पर जगत के सब घाव ले कर
जी रहा था जो वहाँ पर निज व्रणों के स्राव पी कर।
हार कर भी जीत जाने का यहाँ जो स्वांग करता
यह कथानक पीर के ओढ़े खड़ा अभिशाप ले कर।।
पार मुस्कुराते मुखौटे के वह रुदन फिर देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।
गुलमोहर की लालिमा तो आग पी पी कर बनी है
कट रहा सीसा कठिन पर काटती लघु सी कनी है।
जिन्दगी की जीभ से हम सुन रहे हैं गीत मधुरिम
बिम्ब में प्रतिबिम्ब में है समर रार यह कैसी ठनी है।।
बिम्ब की निचली तहों की वह घुटन फिर देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।
चमचमाते रूप ने जो पहने वसन बहु रंग के हैं
मंच पर भी सामने भी दृश्य सब इक ढंग के हैं।
कथ्य क्या,
कर्म में क्या,
भाग्य में क्या मर्म में क्या
बन रहा जीवन विदूषक हास ये किस ढंग के हैं।।
इस मुलम्मे के परे की हम बेबसी को देखते है
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।
भागती इस जिन्दगी के सब मीत पीछे रह गये
जो गढ़े प्रासाद मन के हाय तिल तिल ढह गये।
लोग हम को क्या कहेंगे हम डरे से,
अधमरे से
आग अन्तर में छुपाए बाहर मुस्कुराते रह गये।।
लो उसी इतिहास की खुलती परत को देखते हैं
इस मुखौटे के परे का वह रुदन फिर देखतें हैं।
खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं।।
vvv
पीड़ा
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया
गौतम को जग की पीड़ा ने तपा तपा कर बुद्ध किया।
जन जन की पीड़ा को जब गाँधी जी ने वरण किया
दूर फिरंगी को कर देंगे मन में दृढ़ संकल्प लिया।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।
दुःखी क्रोंच की पीड़ा से ही प्रथम छन्द इक था जन्मा
पीड़ा की जलती वेदी पर बैठे परमहंस शुचि धर्मा।
कुन्ती ने पीड़ा वर माँगा मन से अंगीकार किया
अपनी राम कहानी में भी पीड़ा बनी रही उमर भर कर्मा।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।
युगपुरुषों ने कदम कदम पर कितनी बाधा व्यथा सही
निज कर्मों के आलेखन से जग को अपनी कथा कही।
पगथलियों में पीड़ा के हो चाहे जितने घाव भरे
तपी भगीरथ के अनुपथ पर पावन गंगा धार बही।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।
रजनी के आलोक अश्रु को पातों ने जब जब झेला
उसी भोर ठिठुरी पीड़ा में शबनम मोती बन कर खेला।
तम की काली छलनाओं से जब जब रश्मिपुंज डरा
प्राची से पीड़ा हरने को रवि का अरुण सरोज खिला।।
ओ पीड़ा तुम धन्य धन्य! तुमने करुणा को जन्म दिया।।
vvv
नयनों की भाषा पढ़नी है
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।
ठहरी ठोड़ी मुठिया पर यह मुद्रा अंकित करनी है
चंचल चितवन की छबि तेरी हृदय धरा पर धरनी है।
मौन सुनूँ फिर मौन बुनूँ फिर मौन मौन संवाद झरें
मन से मन की अकथ कहानी बिन कानों के सुननी है।।
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।
अभी मलय के पवन झकोरे अपनी वीथी उतरे हैं
रजनी के जगमग करते ये व्योमकेश अभी बिखरे है
टँके रात के आँचल में ये तारक अभी अभी निखरे है
दुःस्वप्नों के घने छलावे अभी अभी तो बिसरे हैं
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है
अभी प्राण की प्यास शेष है नयन मेरे ये निर्निमेष है
अभी वर्तिका के माथे पर दीपशिखा की तपन शेष है।
अरुण कपोलों पर स्मित से छन्दों का विन्यास शेष है
पुलक प्रीत के स्पन्दन की सिहरन तन में निर्विशेष है।।
वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है।
आज व्यथा को टाँग अलगनी गाथा कोई नई गढ़नी है।।
vvv
मैं बरसती बूँद में हूँ
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
भींग लो उस वल्लरी सी मैं सरकती बूँद में हूँ
इन रुपहरे कुन्तलों पर उन अटकती बूँद में हूँ
जो भिंगो दे मग्न मन को मैं लरजती बूँद में हूँ
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
मैं बरसती बूँद में हूँ
टिपटिपाते इन पनालों में है भरा संगीत मेरा
मौन क्यों वीणा हृदय की हर तार में स्पन्द मेरा
गुन गुनाते इन भ्रमर के पर सने और तन सना
हैं घोलते खुशबू पवन में है वही मकरन्द मेरा
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
मैं बरसती बूँद में हूँ
इन्द्र ने खींचा है नभ में उस धनुष के भित्ति में हूँ
बाँदलों की ओट में जो उड़ रही बकपाँति में हूँ
बूँद प्यासे चातकों की तृप्ति करते स्वाँति में हूँ
बीच घन के उस चपल सी चंचला की ज्योति में हूँ
फेंक दो छतरी अभी तुम मैं बरसती बूँद में हूँ
मैं बरसती बूँद में हूँ
vvv
दिल में फाँस चुभती है
सप्तद्वीपा इस धरा की दूरियाँ सारी मिटा ली
पर मनुज के बीच गहरी खाइयाँ कितनी बना ली।
चन्द्र मंगल सूर्य पर हम शोध में कितने मगन हैं
पर धरा की शान्ति को ही बारुदों से रौंद डाली।।
इस शहर की नींव में वे गाँव कितने ही गड़े हैं
लहलहाते खेत प्यारे सब इसी की बलि चढ़े हैं।
इस विषैले धूम्र से सब बाग उपवन जल मरे हैं
तुम गिरे हैं गर्त में पर चिल्ला रहे हो हम बढ़े हैं।।
मिट्टियों के उन घरों की पीढ़ियाँ भी मर चुकी है
बैलगाड़ी, हल,
तिपाई दीमकें सब खा चुकी है।
अब न डोरे और खुरपी की नहीं पहिचान बाकी
कल, मशीनों से मजूरी,
रोजगारी मर चुकी है।।
ना कुदाली,
पास,
बक्खर और पिराणे शेष कोई
खुरपियों की खप्परों की बात करता है न कोई।
ये सभी इतिहास की बन जाएंगे कोई धरोहर
अब न माटी के वे चूल्हे न लिपी कच्ची रसोई।।
vvv
दीप मैं अविचल अकम्पित
अंधकार पी पी कर भी तो मैं ना हारा ना थका कभी
जल कर तप कर भी तूफानों से रत्ती भर ना डरा कभी
मैं वामन ही सही मगर पग मेरा भी ना रुका कभी
जब तक तन में कतरा भी था मेरा सिर ना झुका कभी
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
हूँ असंख्य किरणों का स्वामी साहस का प्रतिमान बना
मेरे चहुँ ओर उजालों का अद्भुत प्रभा वितान तना
हो चाहे कितना प्रबल बली वह अन्धकार कितना ही घना
मेरी हुँकारो से डर कर वह खड़ा रहा कुछ दूरी बना
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
कुटिया और महलों दोनों में भेद कभी भी नहीं किया
मन्दिर से मदिरालय तक मैंने इक समान सर्वस्व दिया
सारा जग सोया चैन लिये रजनी भर मैने जाग किया
सन्नाटों और शोरों में भी मैं दीपशिखा आधान किया
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
जलती ज्वाला शीष धरे अभिसिञ्चन उसका करता हूँ
अन्तिम श्वाँसों के चुकने तक अविरल सेवा करता हूँ
चकाचौंध तो अब जन्मी है मैं इतिहास पुरोधा हूँ
शाश्वत हूँ धरती बेटा और यूँ जीता हूँ ना मरता हूँ।
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
vvv
वे मेरे ही आँसू हैं
किसी कहानी में जब जब नायक का रोना लिखता हूँ
मेरे निकले आँसू को ही मैं उसके आँसू कहता हूँ।
अवसादों की बरसातें जब मेरा मन झेल नहीं पाता
मेरी कहानी का चरित्र वह भीतर से है घबराता ।।
मेरे पग में चुभी फाँस से नायक को पीड़ा होती है।
मेरे दुःख की करुण कहानी जीना उसको पड़ती है।।
मेरे मन का उद्वेलन ही उसका नासूर बना फिरता।
अनजाने में अपना भोगा उस पर है लादा जाता।।
सच पूछो तो कवि अपना ही इसी बहाने कह जाता है।
जो वह कहीं न कह पाया वो भीतर ही सड़ जाता है।।
प्रिया विरह में बहे अश्रु तब यक्ष नहीं वो रोया था।
कालिदास ने बीज रुदन का अपना उसमें बोया था।।
vvv
पत्र तुम्हारा मेरी थाती
सम्बोधन में केवल 'प्रिय'
ही और अन्त में 'प्रिया'
लिखा था
इन दोनों के मध्य पत्र में मुझको खाली स्थान दिखा था।।
पहले तो समझा जल्दी में तुम कुछ हाल नहीं लिख पाई।
या फिर कलम पुरानी होगी सूख गई होगी सब श्याई।।
या फिर लिखने लायक कुछ भी तुमको नहीं लगा होगा।
अन्तर में मेरे प्रति कोई सोया भाव जगा ना होगा।।
अलट पलट कर देखा जब तो पीछे नोट लिखा पाया।
'तुम'
से हो कर शुरू पत्र यह,
'मुझ'
तक यूँ ही नहीं आया।।
ऊपर खुद तारीख लिखो और पीछे पता स्वयं का लिखना।
बीच प्रिया और प्रिय के, अपने बीच घटा था वह लिखना।।
मैं उन खट्टे मीठे पल को फिर से दोहराने आऊँगी।
गीत लिखे जो तुमने मुझ पर तुम्हें सुनाने आऊँगी।।
फिर से जब पलटा खत उसमें तो तुम ही चित्रलिखी थी।
चारु चपल चितवन मुखड़े पर अधरों पर मुस्कान खिली थी।।
अरुण कपोलों पर कुन्तल की लट कुछ यूँ सँवरी थी।
कोरे कागज की धरती पर तुम छाया बन उभरी थी।।
फिर तो यादों की बरात हृदय के तल पर ऐसे आ उतरी।
जैसे बोराये उपवन में सौ सौ मधुऋतुएँ खुद आ पसरी।।
तब से अब तक मैं प्रतिदिन मुझ को पत्र नया लिखता हूँ।
अपनी कलम पुरानी यादें बिना मोल के मैं बिकता हूँ।।
नाव मेरी कागज की है यह प्रबल प्रेम के सागर उतरी।
अब झंझा कितने ही आवें फिकर सभी की है बिसरी।।
संदेशों के खालीपन में हर दिन नगर नया बसता है।
मेरे मन के पागलपन पे यह सारा जग ही हँसता है।।
vvv
कुछ तो उसकी बात करो
आज हृदय की खोल ग्रन्थि तुम कुछ बोलो कुछ बात करो
रेशम सी वाणी का मधुरस कानों में घोलो बात करो
उन बोलों को फिर दोहराओ प्रथम मिलन पर जो बोले थे
चपल नयन पर रोक पलक को खोल अधर वो बात करो।
आज हृदय की खोल ग्रन्थि तुम कुछ बोलो कुछ बात करो।।
उस पल अपने विकल हृदय की धड़कन की वो बात करो
आँगन की लुक्का छुप्पी और पीपल छैंया याद करो
दूर खड़े ही मन ही मन हम कितने उलझे याद करो
कैसी सिहरन हम में दौड़ी थोड़ा वह संवाद करो।
आज हृदय की खोल ग्रन्थि तुम कुछ बोलो कुछ बात करो।।
याद तुम्हें तो वह भी होगा हम मूरत से खड़े रह गये
पाँव हमारे वहीं निगोड़े खंभे जैसे गड़े रह गये
साँसें, धड़कन,
सुध-बुध सब के सब वे जमे रह गये
जीवन के उन स्वर्णिम लमहों की बोलो कुछ तो बात करो।
आज हृदय की खोल ग्रन्थि तुम कुछ बोलो कुछ बात करो।।
vvv
खाक बस तेरी बचेगी
इस अमावस में भरी है तिमिर की ही सर्जनाएँ
दीप भी सारे बुझे हैं मर चुकी सब वर्तिकाएँ
ढूँढने निकली तमी खुद जुगनुओं की जोत मद्धिम
श्याम घन आ कर खड़ा ले बाजुओं में वर्जनाएँ
ढूँढते हो चाँद को तुम इस निरे थोथे निलय में
खोजते हो क्यों चमन को खुद गढ़े अपने प्रलय में
हे मनुज! तू हो गया इतना निरंकुश और निर्मम
मर चुकी संवेदनाएँ क्या सभी तेरे हृदय में
ठोकरें तुमको लगेगी यह समय चेता रहा है
प्राण के लाले पड़ेंगे कण्ठ ऐंठा जा रहा है
नियति की टेढ़ी भृकुटि भी देख कर अनजान है
काल का भीषण भँवर भी क्यों नजर ना आ रहा है
ईश ने सारी धरा पर भर दिये उपभोग पग पग
तू इन्हें जीवन बना ले रख करीने से ये हर डग
चार दिन की जिन्दगी में सौ बरस का ठाठ भर कर
सर पे बोझा ढो रहा है चाल चलता है तू डग मग
फिर न होंगी ये फिजाएँ ना बहारें ना सुकूं ही
ना चिरैया, ना मधुपरी और जल में जलपरी ही
वृक्ष,
गिरिवर और वन भी नोच डाले बेरहम हो
खुद मरेगा, मार सब को ना बचेगी यह जमीं ही
आज के सुख में तुम्हारी पीढ़ियाँ भी जल मरेगी
बिन हवा के प्राण की ये वंशियाँ फिर ना बजेगी
बींध डाली, इस धरा को कुछ न पानी ही बचेगा
ना रुका अब भी अगर तू खाक बस तेरी बचेगी
vvv
मौसम बीता जाय
आज उतरे मेघ मन पर उर धरा की तृप्ति ले कर
आज अम्बर की पलक पर झुक रहा सावन मुखर।
लोचनों में प्रीत भर कर मैं खड़ा हूँ देख प्रियवर
क्षितिज तक फैली भुजाएँ कण्ठ का मधुभार ले कर।।
तुम न आये प्यार का मौसम युहीं ना बीत जाए।
लौट कर यह दिन कहीं फिर आय या फिर ना आए।।
तुम प्रणय की रागिनी हो मैं बुनूँगा गीत मधुरिम
रेशमी फर सी फुहारों का सुनो तुम साज मद्धम।
आज मन का मोर यह कर यहा है नृत्य छमछम
प्राण में सुलगी अनल जो है बढ़ाती प्यास रिमझिम।।
तुम न आये प्यार का मौसम युहीं ना बीत जाए।
लौट कर यह दिन कहीं फिर आय या फिर ना आए।।
vvv
ओ प्रवासी मानसर के
चेतनाएँ खो चली हैं अब सभी निर्वात नभ में
खो गये संवेदना के स्वर किसी वीभत्स रव में।
बन्दिनी होती हवाएँ अब न होंगी फिर बहारें
उपवनों में पुष्प बिखरे हैं किसी सूखे विवर में।।
लौट जाओ देश अपने ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी इस नगर के उस नगर के।।
लुट चुकी वे शाख सारी नीड़ जिन पर था बनाया
इक पहाड़ी थी यहाँ पर आदमी ने खोद खाया।
अब वहाँ ना वृक्ष होंगे बस निरे गड्ढे बचे हैं
जल रही धू धू धरा यह अब न कोई शेष छाया।।
लौट जाओ देश अपने ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी इस नगर के उस नगर के।।
चील गायब हो गई सब चील गाड़ी उड़ रही हैं
गड़गड़ाती दमकलों की भीड़ भारी जुड़ रही है।
हैं भरे तालाब सारे काईयों जलकुम्भियों से
प्लास्टिकों की थैलियाँ सारे जहाँ में चल रही हैं।।
लौट जाओ देश अपने ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी इस नगर के उस नगर के।।
इस हवा में जहर घोला है प्रदूषण अब चरम पर
कीटनाशक घासनाशक हो रहे भारी कृषि पर।
खा रहे हैं वो हलाहल हर निवाले में सभी हम
हो रहा बाजार भारी आक्रमण है सेहतों पर।।
लौट जाओ देश अपने ओ प्रवासी मानसर के।
हो गये निर्मम निवासी इस नगर के उस नगर के।।
vvv
पत्थर में फूल खिलाओ
पाषाणों से टकरा कर भी देखो निर्झर गाता है।
जलती लू में खड़ा गुलमुहर कितना मुस्काता है।।
गल गल कर भी मेघ धरा की कैसे प्यास बुझाता है।
स्वयं बिखर कर सुमन जगत को सौरभ दे जाता है।।
देखो निर्झर गाता है।
देखो निर्झर गाता है।
कंपते वीणा के तारों ने स्वर लहरों को जन्म दिया है।
तप तप कर ही महा उदधि ने जल जीवन से धन्य किया है।।
पिघल रहा हिमगिरि पर पावन गंगा का वरदान दिया है।
सृष्टि बचाने शिव-शंकर ने स्वयं हलाहल पान किया है।।
देखो निर्झर गाता है।
देखो निर्झर गाता है।
सृष्टि बनाने के पहले खुद ब्रह्मा तप में खूब तपे हैं।
संस्कृति की गंगा लाने को कई भगीरथ यहाँ खपे हैं।।
पग पग पर अवरोध खड़े पर दरिया इनसे कहाँ रुके हैं।
तूफानों की कमी नहीं पर मस्तूलों के सिर न झुके है।।
देखो निर्झर गाता है।
देखो निर्झर गाता है।
जीवन इतना सरल नहीं है झंझावात कई आवेंगे।
दुर्गम पथ हैं शूल भरे हैं पग में छाले भर जावेंगे।।
निज श्रम और विश्वास स्वयं में सदा बनाये रखना।
साहस के सिर मुकुट सजेगा बन्दी जन गुन गावेंगे।।
देखो निर्झर गाता है।
देखो निर्झर गाता है।
vvv
महाविनाश की ओर
भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से।
तृप्ति ले कर चल रही हर बूँद धरती से गगन से।।
जान लो इक ग्रास भर का अन्न महिनों में उपजता।
कई वर्षों तक है तपता तब कहीं यह वन सरसता।।
भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से।
यह धरा है माँ हमारी, पालती है चर अचर को।
खाद कृत्रिम डाल कर विष से भरा इसके उदर को।।
मौन धरती कँपकँपाती इस तरह इस क्रूर नर से।
जो विकासों की कहानी गढ रहा विध्वंस ही से।।
भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से।
जब न था विकसित जगत तब लोग सब ही स्वस्थ थे।
स्वच्छ थे तब तत्व पाँचों, सदा नीरा सरित नद थे।।
स्वानुशासन में मनुज थे,
प्रकृति लावण्यमय थी।
बस्तियाँ, बन-बाग घर घर, हर गली वे मोदमय थी।।
भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से।
बस अर्चना में अरु हवन में हम वरुण को पूजते हैं।
वृक्ष के तन काट कर ही हम पुरन्दर पूजते हैं।।
विष उगलती चिमनियों से हम पवन को रौंदते हैं।
प्यास का नगदीकरण जल बोतलें भर बेचते हैं।।
भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से।
रोज बढ़ते ताप से तप यह हिमालय गल रहा है।
विश्व बढ़ते तापक्रम की भट्टियों में जल रहा है।।
सूखती इन जल शिराओं में बची है बाढ़ केवल।
हो रहा विकसित जगत बस यह कथानक चल रहा है।।
भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से।
सागरों से उठ चले घन हरितिमा को ढूँढ़ते हैं।
वन कहाँ सब गुम हुए है प्रान्तरों से पूछते हैं।।
हम कहाँ बरसें कहाँ ठहरें कहाँ बैठें बता दो।
पर्वतों के पत्थरों से पीट माथा खीजते हैं।।
भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से।
अब न होगी गोधूली ही भूमि गोचर नहीं बची है।
नोट छापू बाग उपवन,
यह महा माया रची है।।
पंछियों के नीड़ बिखरे,
अब गोरैया कुछ बची है।
वनचरों के वंशजों पर तीर तलवारें खिंची है।।
भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से।
vvv
यह मेरा इन्दौर है
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है।
जो कदम हमने चले पदचिह्न बनते वे गये।
गढ़ लिये प्रतिमान हमने कर्म से सब नित नये।।
युग प्रवर्तन के नये संकल्प भर कर मुट्ठियों में
स्वच्छता के ध्वज तले एकत्र जन गण सब हुए।।
यह मेरा इन्दौर है,
यह राष्ट्र का सिरमौर है।।
शहर के बच्चे बड़े सहभागिता इसमें किये हैं।
स्वच्छता के सूत्र सारे विश्व ने हम से लिये हैं।।
पञ्च तत्वों के प्रदूषण खत्म कैसे हों शहर से।
जन-प्रशासन ने हमारे लक्ष्य हाथों में लिये हैं।।
यह मेरा इन्दौर है,
यह राष्ट्र का सिरमौर है।।
कान्ह और यह सरस्वती स्वच्छ नीरा हो बहेगी।
छत्रियाँ तट पर विरासत की कथाएँ खुद कहेंगी।।
राजवाड़ा है हृदय में मराठा-शौर्य का इतिहास गाता।
रंग की पिचकारियाँ उल्लास की गाथा कहेगी।।
यह मेरा इन्दौर है,
यह राष्ट्र का सिरमौर है।।
थी कभी यह राजधानी सूत की और सूतमिल की।
थी श्रमिक को बाँटती आजीविका परिवार भर की।।
कौन जाने इस नगर को क्यो नजर काली लगी।
छिन गया वैभव श्रमों का छिन गई थी शान्ति जन की।
यह मेरा इन्दौर है,
यह राष्ट्र का सिरमौर है।।
पर शहर जीवट हमारा फिर नई अंगड़ाई ले ली।
कृषि उपज और मण्डियों ने राह अपनी खोज डाली।।
फिर जगा व्यापार का इक नया अभिसार ले कर।
शहर हो स्मार्ट सूरत फिजाँ मिल कर बदल डाली।।
यह मेरा इन्दौर है,
यह राष्ट्र का सिरमौर है।।
चल शिखर की श्रृंखलाएँ हर क्षेत्र में अपनी बनाएँ
सीखने यह विश्व सारा हैं ऑंगने इन्दौर आए
भोग छप्पन बाफलों संग आएँ और सब जीम जाएँ
मालवी की मालवा की मधुरता सब को चखाएँ।।
हम सभी मिल कर इसे फिर राष्ट्र का गौरव बनाएँ।।।
यह मेरा इन्दौर है,
यह राष्ट्र का सिरमौर है।।
vvv
जागा अरुणिम भोर प्रिये
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!
मानो ऊषा की चूनर ने जगती,
पर रोली बिखराई।
नव प्रभात में जैसे तुम बन,
कमलकली हो मुसकाई।
नयन मिले फिर हृदय जुड़े, जग की सब सुध बुध विसराई
रजनी जैसे अलस रही आँखों में भर भर अरुणाई।।
पल पल प्रमुदित अहसासों से भरे भरे हैं अहा हिये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!
मेरे स्वप्नों को पंख लगे अलि प्रसून मुख चूम रहा
लतिका के अवगुंठन में यह आँछ गाँछ है झूम रहा।
अहसासों के अनुबन्धों में बन्धन का ना जिक्र रहा
मौन मुखर और मुँदे अधर ने संवेदी संवाद कहा।।
इस पल की छाया में हमने कितने कितने कल्प जिये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!
नयन बोलते नयनों से अहसास गुँथे से रह जाते हैं
नेह भरे मन के निर्झर ये झर झर कर झर जाते हैं।
बिन पल्लव के रूखे टेसू नव प्रसून से भर जाते हैं
पद्मपत्र पर ठहरे जल कण पद्मराग हो जाते हैं।।
मत्थर बहती मदिर पवन ने कितने मादक गान किये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!
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मैं थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ
माँ बाबा की गोदी में मैं कुछ थोड़ा सा छूट गया हूँ
तुतलाती बोली ले उनके कानों में कुछ छूट गया हूँ
पलटा पीछे तो देखा वे कहीं दूर जो निकल गये हैं
खेल नियति के देख देख मैं बचपन में ही खूट गया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ
खड़िया की टूटी कलमों का मुँह में स्वाद अभी बाकी है
थूँक लगा कर लिखा मिटाकर पट्टी कैसे ढाँकी है
छड़ी गुरू की हाथ पड़ी थी अब भी मुझको याद बड़ी है
फिर भी सिर पर नेहिल उनकी छुअन अभी बाकी हैन्
पहले गुरू की पहली शिक्षा घूँट घूँट कर तभी पिया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ
अन्नी चन्नी, लंगड़ी में कुछ अंगबंग और चोक चंग में
सोलह सार मंडी फर्शी पर रोत्ता खेले यार संग में
होली के वे शक्कर गहने, पहने फिर कुट कुट खाये थे
कैसी शरम सरल बचपन में खेले खाये अजब ढंग में
उन सोने चाँदी के दिन में थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ
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मन मीत कोई गाने लगता है
विकल हृदय और तृषित अधर पर
जब से तेरी नवगुलाब की
दो पंखुड़ियों की छुअन मिली है।
मन की तपती हुई धरा को,
ओ शुष्क कंठ को
अमित नेह के रुचिर मेघ की
मीठी बूँद मिली है।।
मुझमें इक पावस जगता है।
मन गीत कोई गाने लगता है।।
शतदल से इस हृदय पत्र पर
बैठे हैं शबनम के मोती
अम्बर की चूनर में राका
तारक की मणिमाल पिरोती
प्रखर प्रेम में सनी वर्तिका
थाम खड़ी है जगमग ज्योति
ऐसे में पढ़ने को आतुर
तेरे इन नयनों की पाती
यह प्रेम दीप ऐसे दिपता है।
मन गीत कोई गाने लगता है।।
जी चाहे फिर प्यास लगे,
फिर नयनों में आस जगे
फिर सीपी के फलक खुले वो
मोती का सा प्रेम पगे।
यह प्रेम दीप ऐसे दिपता है।
मन गीत कोई गाने लगता है।।
रीती गागर, सूने पनघट,
पनिहारिन के रसरी के संग
सर सर कर आती जाती
स्वाँस जगे प्रश्वाँस जगे।।
अवगुण्ठन को जी करता है।
मन गीत कोई गाने लगता है।।
vvv
दो घूँट प्यार के ला देना
नहीं चाहिये सोम मुझे दो बूँद नेह की मिल जाए
नहीं मलय का चन्दन चाहूँ रिश्तों का लेपन मिल जाए।
मैं समझूँगा झोली में सब हीरे माणिक रत्न भरे है
नजर प्यार की पल भर को ही हौले से गर छू जाए।।
दो पल मुझे जिला देना,
दो घूँट प्यार के ला देना।।
मेघदूत देखे बहुतेरे जो ले प्रेम पत्र उड़ते फिरते
उपवन में चहके चंचरीक गुन गुन कर गुंजन हों करते।
मैं तो उन मीठे शब्दों की प्यास लिये बैठा हूँ
जो दिल के छालों पर मरहम सा लेपन हों करते।।
दो पल मुझे जिला देना,
दो घूँट प्यार के ला देना।।
नहीं चाहिये इन्द्रधनुष के वे चटकीले से सात रंग
अमलतास की पीली लटकन झालर सा वह ढंग।
मेरी चाहत मसि पाने की जिससे लिख डालूँ
जीवन में अपनों संग जीने वाली अलमस्त तुरंग।।
दो पल मुझे जिला देना,
दो घूँट प्यार के ला देना।।
vvv
गीत सृजन के गावेंगे
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?
तुम चलो उजालों की धरती पर छाया साथ रहेगी।
मिले भले पूनम की रातें मावस भी तो तुम्हें मिलेगी।।
सुख की बिजली यदा कदा अँधियारे में दमकेगी।
दुःख की काली घनी बदरिया मौजूद सदा रहेगी।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?
बैठ शिखर पर ध्वजा बिचारी सदा पवन से लड़ती है।
मेंहदी सिल पर घिस-घिस कर ही हाथों में रचती है।।
ऊँचे वृक्षों महलों पर ही बिजली अक्सर गिरती है।
कितना तपा हिमालय पूछो हमको तब गंगा मिलती है।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?
कितने सहे प्रहार करारे पत्थर ने मूरत बनने तक।
टूटे कितने पत्थर कण-कण धारा से प्रपात होने तक।।
मिट्टी ने गल-तप कर ही तो रम्य इमारत बनती है
बीज मिटा है गल कर सड़ कर पादप के आने तक।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?
हम जीवन की अक्षय निधि को पा कर भी बिसरे हैं।
छोटी छोटी मुश्किल से भी धूल कणों के से बिखरे हैं।।
जितने भी अवतार हुए वे अन्तःपीड़ा से गुजरे हैं।
पर साहस और धर्म पर चल और अधिक निखरे हैं।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?
जंगल हैं तो कभी कभी वे दावानल भी आवेंगे।
कश्ती को भी सागर में वे निर्मम तूफान सतावंगे।।
काँटे कितने शाख उगेंगे फिर भी फूल खिलावेंगे।
हार जीत का ख्याल भूल हम गीत सृजन के गावेंगे।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?
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दो दिये दो जिन्दगी
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
जब गढ़ा था तन हमारा, एक से थे तेल-बाती।
एक सी ही ज्योति वह है जो हमें आकर जलाती।।
नाम भी तो एक ही है पर मुझे आला मिला है।
पर तुझी से अप्सराएँ थालियाँ अपनी सजाती।।
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
तुम सजे फानूस में यह भाग्य है प्रियतम तुम्हारा।
इन कुटीरों के तमस से लड़ रहा हूँ मैं बिचारा।।
सोच लो पर इक घड़ी ही जल रहे हैं एक से हम।
गर्व को तुमने प्रकासा जिन्दगी का हूँ मैं सहारा।।
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
तुम छतों पर कैद हो कर रोशनी की हो गवाही।
देखते तुम प्यालियों को भर रही कैसे सुराही।।
देखता मैं जिन्दगी यह लिख रही कैसी सचाई।
क्रन्दनों के गाँव में जो लिख रहा बचपन रुबाई ।।
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
टट्टरों से झाँकती है घूरती प्यासी निगाहें।
मोल में बिकती जवानी ओट में लेकर कराहें।।
ये वही तो लोग हैं जो तेरी बस्ती से हैं आये।
कान उनके ना सुनेंगे चीख और इनकी कराहें।।
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
जिन्दगी जब लौटती है मुट्ठियों में प्राण ले कर।
भार तन का झेलती अवसाद का अहसास ले कर।।
गिट्टियों के संग टूटे हाड़ और फिर भाग इनके।
कट रहा कैसा सफर हर ओर है बहपा कहर।।
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
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स्मृतियों में सदा जियूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा।
तुझे जिया हूँ जीते जी मैं छोड़ सुधा क्या गरल पियूँगा।।
मुझ में कितना दर्द घुला है।
काँटों ने भी मुझे छला है।।
तप तप कर कितना पिघला मैं।
तब साँचे में तेरे ढला मैं।।
तुझे भरम है भूल जायगा, फिर फिर तुझमें मैं लौटूँगा।
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा।।
क्या वे माटी के लमहे थे।
जो पानी से बह निकले थे।।
क्या वे वचन निरे फिकरे थे।
सौ सौ जो सौगंध भरे थे।।
उन्ही पलों की याद दिलाने, फिर फिर तुझमें मैं लौटूँगा।
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा।।
वट की लटकी हुई जड़ों की।
पींगें क्या तुम बिसर गई हो।।
बेंदी चौड़े भाल सजा कर।
नव कलिका सी निखर गई हो।।
उन बिम्बों की सुधी कराने, फिर फिर तुझ में लौटूँगा।
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा।।
चुपके चुपके उन तारों की।
झिलमिल फिर फिर वही कहेगी।।
भाव भरे शब्दों की दिल में।
रसधारा फिर वही बहेगी।।
उन शब्दों भावों में घुल कर, फिर फिर तुझ में लौटूँगा।
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा।।
श्यामल कुन्तल की वेणी में।
बूँदनियों की माल सजी थी।।
माटी पहली बारिश पी कर।
जब तन मन में सौंधी महकी थी।।
याद उसी की तुझे दिलाने, फिर फिर तुझ में लौटूँगा।
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा।।
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ऐ जिन्दगी
जिन्दगी मोड़ दे कर मुझे
खुद तो वहीं खड़ी है।
कई ख्वाहिशें गलियारों में
अब भी वहीं पड़ी हैं।।
ऐ जिन्दगी खुद याद कर
तू कब गले मिली थी।
बस मैं ही चला अकेला
तू साथ कब चली थी।।
खुश्क है तेरी हवाएँ
पी गई पानी नयन का ।
सूख कर काँटा हुआ हर
फूल मेरे इस चमन का ।।
गुजरते हुए पलों की
रफ्तार कम तो कर ले।
ले लूँ जरा सा दम मैं
तू भी जरा तो दम ले।।
लौटेंगे फिर कभी ना
जो जो भी मेरे संग है।
फिर से न मिल सकेगा
यही मौज की लहर है।।
फिर कब जुड़ेंगे मेले
अपनों का साथ इतना।
टूटे न ख्वाब कोई
अब टूटे न कोई सपना।।
छोटी सी मेरी अँजुरी
थोडी बिसात इसकी।
है डोर मेरी उलझी
थगती हुई पतंग की।।
इक दौर वो था जिसमें
रोशन चराग थे सब।
इक दौर ये है जिसमें
श्याही में डूबी है शब।।
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कस्तूरी के मृग
कस्तूरी के मृग ही क्यूँ यूँ जंगल जंगल भाग रहे हैं।
पावन प्रेम पला जिन उर में वे सारी रातें जाग रहे हैं।।
अँधियारों से लड़ने वाले आले के सब दीप बुझे वे।
प्रात किरण से रो रो कर फिर से जीवन माँग रहे है।।
अधरों की पहचान बनी यह प्यास और डर का कंपन।
बहते नयनों को कोरों में ठहरेगा कैसे कोई अंजन।।
फूलों पर उस मृत तितली के अब तो केवल पंख बचे हैं।
प्रेम ग्रंथ में विरह व्यथा के किसने ये सोपान रचे हैं।।
हलकी सी चलती बयार से कॅंप जाती है शिखर पताका।
शबनम के आँसू पातों पर छोड़ गई वो ठिठुरी राका।।
पनघट, अमराई, चौपालों पर नहीं किसी ने ताका।
सुबक रहा आँगन का बिरवा बरसों से ना कोई झाँका।।
सूना नगर, हवेली सूनी कभी यहाँ वे रंगमहल थे।
सखियों की थी चुहलबाजियाँ चंचल चपल शगल थे।।
आगत के आगम में जिनके पलक पाँवड़े बिछ जाते थे।
उनमें से कुछ सुखद सलोने मीठे सपने बो जाते थे
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तुम न आए
दुआ करो कि अब मेरी
याददाश्त ही खो जाए।
दिल के दरिया में बहते पल
लौट कहीं न फिर आ जाएँ।।
बीते तन और रीते मन में
फिर से ज्वार नहीं आ जाए।
अवगुंठन के शहदी सपने
नयन कोर में धुल न जाए।।
सांझ सकारे अपने द्वारे
देहरी का दीपक कहता है।
सब जग लौटा ठौर ठौर पर
बाट निहारूँ, तुम ना आए।।
जो कहानी जी रही मैं
मर चुकी कब की उसी में।
मौत ने लिख दी इबारत
मैं जली फिर फिर उसी में।।
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दीप जलता रहा
मिट्टी का ढेला जमीं से उठाया
तुम्हीं ने मुझे चाक पर था चढ़ाया।
हुई रोशनी तैल बाती दी तुमने
अंधेरों से लड़ने हमें था सिखाया।।
मैं मिट्टी था मिट्टी थी पहिचान मेरी
मेरी जात औकात मिट्टी थी मेरी।
बैठा था गोदी, धरा मेरी माँ थी
फ़कत है जगह ताक में अब तो मेरी।।
आँखों में आँखें धरे चाँद तारे
बतियाते थे सब वो सगे थे हमारे I
दीवारो दर में बने हम तो बन्दी
हमारी नजर में हमीं हैं बिचारे।।
मिला सुब्ह सूरज तो इतरा रहे थे
ढली शाम साये जब गहरा रहे थे।
जले हैं हमीं आग पी पी के ऐसी
जला के हमीं खुद को, शरमा रहे थे।।
ये अलग बात है हमसे रिश्ते नये हैं
हुई रोशनी संग अपनी सगाई।
सीखा है हमने यूँ जलना खुशी से
पीड़ा जलन की है जग से छुपाई।।
परवाना जब भी, जलता है मुझ में
बैठ बैठ जाता है,
मजबूर दिल ये ।
बुझूँगा जलूँगा कई बार मैं तो
इसे जिन्दगी तो, मिलेगी ना फिर ये।।
देखे हैं मैंने कई रंग जग के
आले में चुपचाप दर्शक बना हूँ।
कभी प्रेमियों की चुहल भी सुनी है
कभी प्रेम के मैं रस में सना हूँ।।
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प्राण की वंशी
तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है।।
साँझ सोई इस अलसती रात की मृदु गोद में।
तारिकाएँ श्वेत गंगा की पलक से झाँकती है।।
नील सर के नील शतदल पत्र पर हैं राह तकते।
मन्द बहती है पवन पर फिर भी लगता त्रासती है।।
प्यास अपने कण्ठ ले कर चिर वियोगन जागती है।।
तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है।।
झुरमटों से हैं महकते बाग, बन,
उपवन मनोरम।
श्वेत, रक्तिम,
पीत पुष्पी लिग्गियाँ पथ में टँगी है।।
चुलबुले कलहंस सर में संग भ्रमरों की ये सरगम।
कूकती कोयल किनारे मधुमास जैसे माँगती है।।
बिन तुम्हारे इस हृदय में शूल जैसी सालती है।।
तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है।।
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मुक्तक
फल फूली हर शाख मुखर है मन का मधुबन
आणंद बेली महक रही,
भ्रमर गुंजारे गुनगुन।
आँगन आँगन सजी रंगोली,
माँडन लगे सुहावन
उतरा आज गगन से डोला, वासंती मन भावन।।
आइना कहता रहा कि जानता हूँ मैं तुम्हें
मैं मुकरता ही गया कि तुम मुखौटा पढ़ रहे।
पर कोई बैठा छुपा है सक्ष मेरी ही खुदी में
रात दिन बस बिम्ब दोनों द्वद्व कैसा लड़ रहे।।
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तुम्हें सौंपता हूँ
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
अँधेरे का दीपक मेरे साथ में है
रातों का काजल मेरे हाथ में है
मैं दिन के उजाले तुम्हें सौंपता हूँ।
कश्ती फँसी है जो तूफां में घिर के
नजर से तुम्हारी उसे यूँ बचा कर
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
हुई शूल के संग आज मेरी मिताई
खिले फूल गुलशन से होती चुनाई
वही फूल अब मैं तुम्हें सौंपता हूँ।
झरे पात पतझर में तन से भले ही
बची थी फखत सूखी शाखे भले ही
मैं फिर भी नई कोंपलें सौंपता हूँ।।
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
मेरे स्वप्नों के ये जखीरे पड़े हैं
कई प्रश्न पलकों पे मेरे खड़े हैं
फलक के सितारे तुम्हें सौंपता हूँ।
निरी प्यास ठहरी अधर पे है मेरी
रुँधा कण्ठ अवरुद्ध वाणी है मेरी
मैं गीतों की सरगम तुम्हें सौंपता हूँ।।
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
हुई भोर तारे बिदा हो चले हैं
बुझते चिरागों के तन भी जले हैं
सुबह की किरन मैं तुम्हें सौंपता हूँ।
न फिर याद करना न फिर याद आना
ये आबाद बस्ती ये दिलकश जमाना
मैं तोहफे में जीवन तुम्हें सौंपता हूँ।।
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
तुम्हारा सफर तेज रफ्तार का है
चल ना सका हम कदम बन के तेरे
मैं दिल की धड़कन तुम्हें सौंपता हूँ।
कैसे मैं भूलूँ पलों के वे मेले
बसे हैं जो अन्तस की गहराइयों में
उन्हें भर के गठरी तुम्हें सौंपता हूँ।।
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
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पीर मेरी मधुबनी
इस हृदय की भित्तियों पर जो लिखे कड़वे कथानक।
खोजता क्यों बावरा मन दंश की पीड़ा अचानक।।
शुष्क अधरों पर निगोड़ी प्यास ही ठहरी हुई है।
दौड़ते मृग शावकों को छल रहा मरु ज्यों भयानक।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
क्यों तिमिर के इस निलय में रोशनी को ढूँढते हो।
रेत के पदचिन्ह गिन कर जिन्दगी को बूझते हो।।
रिस रहे थे व्रण बिचारे क्या उन्हें तुम देख पाये।
जान कर भी बेतुके ये प्रश्न तुम क्यों पूछते हो?
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
मर चुकी संवेदना अब ओस की कहती कहानी।
उपवनों की गन्धवह थी यह पवन होती मसानी।।
उम्र के माथे लिखी जो सिलवटें कहती जुबानी।
क्रन्दनों के इस नगर में खोजते हो तुम रवानी।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
फिर कोई आ कर व्रणों पर खार सारा धर गया है।
जो दबे थे तह तले फिर पल हथेली धर गया है।।
रागिनी क्यों ढूँढते हो बाँस की इस पोंगरी में।
सांझ का प्रहरी सितारा इस सुबह में मर गया है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
मैं अकेला ही भला हूँ यह पीर मेरी संगिनी है।
मैं रहा अनुचर उसी का वह मेरी जो स्वामिनी है।।
पीर मीरा की प्रणय था पीर में नवजात सुख था।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
गीत पीड़ा के स्वयं ही गान अपने गा रहा है।
उन सुरों की वेदना में सुख समझ सुख पा रहा है।।
इस हृदय को रास आई पीर संग मेरी सगाई।
भित्तियों के वे कथानक फिर हृदय दोहरा रहा है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
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सिलवटों के पार से
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ।
दर्द ने लिक्खे कसैले घाव आओ मैं दिखाऊँ।।
जिस लड़कपन को कभी काँधे बिठाया था।
भूख खा कर खुद उसे माखन खिलाया था।।
खोल गठरी से व्यथा की यह कथा तुमको बताऊँ।
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ।।
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ।।
इक सलोना स्वप्न हमने प्यार से ऐसा संजोया।
देव पूजे,
भात , धोक दे कर सिर नवाँया।।
तब कहीं जा कर हमारी गोद में शिशु एक पाया।
सो सके वह नींद भर इसलिये खुद को जगाया।।
खर्च कर अपनी जवानी पालने बचपन झुलाया।
उम्र की बीती कहानी आओ तुमको मैं सुनाऊँ।।
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ।।
स्वप्न अपने रहन रख कर सब खुशी उसकी खरीदी।
पाँव के छाले छुपा कर जूतियाँ ला कर उसे दी।।
था सजा आँगन हमारा गूँजती किलकारियों से।
खर्च डाले जो जमा थे ढूँढ कर अल्मारियों से।।
हार थक कर लौटते थे दिन दिहाड़ी के कड़े थे।
उस थकन की पीर को मैं अब तुम्हें कैसे बताऊँ।।
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ।।
फिर समय नें बदल करवट तीव्र तेवर थे दिखाए।
थे जिन्दगी की ओढ़नी में पेच टाटों के लगाए।।
वे उँगलियाँ,
हाथ,
माथा चूमते थे लाड़ से हम।
हाय यह हत भाग्य कैसा हो गए कितने पराए।।
झुर्रियों से ढूँढ कर मुस्कान मुह पर कैसे लाएँ।
छूटते दर और टूटते घर की कथा कैसे सुनाऊँ।।
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ।।
देखता हूँ दृश्य, आश्रम द्वार पर नजरें गड़ी थी।
कीमती उस कार से काय कृश उतरे खड़ी थी।।
जर्जराती जिल्द में हो कामायनी जैसे मढ़ी थी।
जिन्दगी बस खार लेकर आँसुओं से वह झड़ी थी।।
तुम इसे सन्यास का बस नाम दे कर चुप रहोगे।
उस हृदय की मर्मभेदी चीख मैं तुम को सुनाऊँ।।
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ।।
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सेवा का हवन कुण्ड
सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ
अगन बने फिर लगन हमारी सर्व समर्पित हो जाए।
तन-मन तप कर संकल्पों का मंगल सूत्र बँधाएँ
शुद्ध भाव की अरणी ले कर पावन ज्योति जगाएँ।।
सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ।
इस समष्टि का हर कण कण सेवा में आहुतियाँ देता
नदियाँ बहती सूरज तपता पवन प्राण ले क्यों बहता।
सागर अपना पानी दे कर इस जग में जीवन धरता
अम्बर अपने महा उदर में सृष्टि अनेकों क्यों भरता।।
सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ।
इनमें से कोई भी अपना मूल्य कर्म का नहीं माँगता
इस निर्बाध क्रिया में वह अपना नियम नहीं लाँघता।
ये सब सेवा का प्रकल्प ले आदिकाल से लगे हुए हैं
फिर भी रहते मौन सदा ये ना कोई उपदेश बाँटता।।
सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ।
सेवा के इस महायज्ञ से महामारियाँ भी हारी हैं
मानवता की प्रतिरक्षा में सेवा ही सब से भारी है
हर सेवक नर में नारायण आ कर स्वयं उतरते हैं
इसीलिये कष्टों के पल में भी तो यह सेवा जारी है
सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ।
आओ प्रिय इस महायज्ञ में आहुतियाँ अपनी डालें
हो वेद ऋचाओं का उच्चारण तब हम हाथ स्रुवा लें।
अपनी धरा गगन अपना है मन में सेवा दीप जला लें
पीड़ित मानवता की सेवा में तन मन प्राण लगा लें।।
सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ।
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सृष्टि है यह ईशमय
चाँदनी कब थी अलग जो चाँद में नभ में घुली
रोशनी को सूर्य से ना तुम अलग देखा करो।
इस सनातन सत्य को तुम जान लो पहचान लो
इस जगत की अस्मिता को ईशमय देखा करो।।
सृष्टि का साकार दर्शन उस परम का दर्श समझो
जो पवन छू कर गई यह है मृदुल स्पर्श उस का।
भूख भी उसने बनाई अन्न भी उसने दिया है
वह पचाता जठर में खेल यह सब है उसी का।।
पाँच भूतों,
पाँच तत्वों, पाँच प्राणों से बनाया
इन प्रपञ्चों से बुना है यह महा जंजाल समझो।
इन्द्रियों के पंचकों से इस कर्म का साधन लगाया
बुद्धि, मन और चित्त जोड़े यह तेरे भीतर सजाया।।
ज्योतियों की है परम ज्योति जो हमें ना दीख पाती
सूक्ष्मतम प्रज्ञा हृदय में ज्ञान का दीपक जलाती।
चेतना बन प्रभु हमारे सर्व में बसता निरन्तर
वह चलाता,वह जिलाता न दृष्टि अपनी देख पाती।।
चेतना भर प्राण में, इन इन्द्रियों में और तन में
चर अचर में व्यापता है और है हर सूक्ष्म कण में।
दीखते न कर कहीं पर सृष्टि सारी रच रहा है
रंच भर न है कमी उसके करम में और सृजन में।।
प्यास भी वह दे रहा है फिर बुझाने का जतन
भूख का अध्यास दे कर दे रहा उसका शमन।
रात का दे कर तमस दी रोशनी भी सूर्य की
जाग दे कर नींद का कैसा निराला है प्रबन्धन।।
सत्य है केवल वही जगत मिथ्या का मिथक
सृष्टि के पहले वही था सृष्टि का केवल सृजक।
जो प्रलय के बाद भी होगा सिर्फ वह ब्रह्म ही
सृष्टिस्थितिविनाशानां है कार्य कारण सब वही।।
वचन अगोचर,
दृष्टि अनामय, सृष्टि नियन्ता वो ही
अशरण शरण,
भव-भय भंजक परमोद्धारक वो ही।
उसमें सब है सब में वह है होता वह,
कर्ता वो ही
सब में उसको देखे जो नर ईश कृपा पाता वो ही।।
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सभी आईना पहन लें
मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही
न तू देख पाया तेरी ही खुदी को।
है सारा नगर देखता दूसरों को
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।।
कैसा है तू और है कैसा जमाना
उमर अपनी है, अब तक खपाई।
बुरा ही बुरा सब है मेरे अलावा
सब की अकल में यही बात आई।।
अब हर गले में,
टँगा आईना हो
नकली मुखौटे चलो सब उतारें।
देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में
जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।।
है बाहर जगत, एक भीतर जगत
ये देखी जमी, लोग देखे हजारों।
कभी सामने,
कभी मन में हमारे
जगे अपनी प्रज्ञा, चलो अब पुकारो।।
जगते में सपना है सोते में सपना
सपना हुआ ना कभी कोई अपना।
ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा
पहचाने मिथ्या ओ निज रूप अपना
ना तो ये सच है और ना वो भी
सभी लोग अपने हैं आओ पुकारें।
ना तो ये सच है और ना वो सच है
चर में अचर में जो मौजूद रहता
सृष्टि के पहले, प्रलय के भी आगे
वही ब्रह्म था और वही शेष रहता
चलो आँख में ऐसा अंजन लगाएँ
जगें नीद से और सब को जगाएँ
जमीं आसमां ये अगन ये पवन
बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें।।
है सारा नगर देखता दूसरों को
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।।
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खामोश चिट्ठी
तुम्हारे नाम से शुरू मेरे नाम से खत्म मेरी चिट्ठी
इस बीच कोई लिखा हाल न खबर ये मेरी चिट्ठी
हर बार फिर भी तुमने सिद्दत से पढ़ी मेरी चिट्ठी
मेरे दिल से तेरे दिल का नाजुक जोड़ मेरी चिट्ठी
हो गया होगा महसूस उन लफ़्जों और जुबान का
जो बयान करती है जो खामोशियाँ मेरी चिट्ठी
इन्हीं खामोशियों ने फिर गज़ल गाई नज़्म गाई
बिना बोले भी कितना बोलती है ये मेरी चिट्ठी
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गर मैं पागल होता
गर मैं पागल होता
गर मैं पागल होता तो।
बस तू होता और मैं होता
प्याले पर नाम तेरा होता।।
तो विष भी वह अमृत होता।।
आँसू धार बही सब खातिर
पर एक बूँद तुझे चढ़ जाती।
मेरे अगले पिछले सारे
जनम जनम के अघ धो जाती।।
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
लौटा दे वह भोला बचपन
जब तू संग रमा करता था।
तुतलाती लटपट बानी तू
जो हर बार सुना करता था।।
मुझे जिताने खातिर नटखट
खुद तू हार लिया करता था।
रोता था मैं जब जब गिर कर
बढ तू थाम लिया करता था।।
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
मैंने कभी नहीं माँगा कुछ
सब देता है, तेरी मर्जी।
चाहे दे इस हाथ अभी ये
फिर लौटा ले, तेरी मर्जी।।
जनम मरण है हाथ तुम्हारे
यह जीवन भी, तेरी मर्जी।
बाहर भीतर तू ही तू है
इतना सा गर समझा होता।।
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
जर्जर मेरी नाव हुई है
तट भी छूट गये हैं सारे।
धार तेज है भँवर बड़े हैं
तन भी मन भी दोनों हारे।।
बिन पतवार बही जाती है
मेरा भरोसा है कि तुम ही।
मातु पिता या बन्धु बनोगे
भव से तारोगे बस तुम ही।।
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
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ऐ! नभ ऐ! विराट
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार।।
तुझ में बसते है सूर्य चाँद
क्या नाप सका कोई प्रसार।।
तू हर खाली घट में रहता
तुझ में ही तो सारे घट हैं।
धरती मानव जीव जन्तु की
जीवन सरिता का पनघट है।।
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार।।
अम्बर तुम इतने विराट
क्षीर समुद्र कहाते हो तुम।
ग्रह नक्षत्र तारिकाओं के
आश्रय दाता हो केवल तुम।।
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार।।
तुम असीम तुम महाशून्य
तुम पंच तत्व में भी प्रधान।
सृष्टि उदर में बसी तुम्हारे
है इसीलिये महिमा महान।।
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार।।
नारायण तुझ क्षीर सिन्धु में
शैया शेष लिये बसते हैं।
सप्त लोक और भुवन भी
तेरे आश्रय में रहते हैं।।
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार।।
तुम में बादल और पखेरू
हैं आजाद विचरते रहते।
पवन प्राण और गन्ध लिये
तुम में ही नित बहते रहते।।
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार।।
गरिमा लघिमा और महिमा
इन शक्ति के तुम हो धर्ता।
बिन तेरी इस महिमा के यह
सृष्टि सृजन ना सम्भव होता।।
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार।।
vvv
गगन तुम्हारे अमित रूप
गगन तुम्हारे अमित रूप,
पर हर रूप निराला है
दिन में कितना उजला है, और रजनी में काला है।
सघन घनों को धरते हो तो,
श्यामल तुम हो जाते हो
स्वच्छ सलोने हो कर तुम, नील गगन कहलाते हो।
गगन तुम्हारे अमित रूप,
पर हर रूप निराला है।।
प्राची में जब अरुणिम ऊषा, सूरज ले कर आता है
वह कनक थाल तब तब, कुंकुम रोली बिखराता है।
कभी टाँक लेते हो तन में,
तारक हीरे माणक मोती
कभी चाँदनी घोल धरा को, पहनाते दुधिया धोती।
गगन तुम्हारे अमित रूप,
पर हर रूप निराला है।।
बने क्षितिज पे नील कटोरा, तान रहे हो तुम वितान
इसमें जग ने हर दिन देखे, नित नूतन नव-नव विहान।
कभी चंदोवा तनता नभ में रजत थाल सज जाती है
अमृत की गागर फिर भर कर धरा धाम नहलाती है।
गगन तुम्हारे अमित रूप,
पर हर रूप निराला है।।
vvv
बारिश की बूँदें
चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें।
शबनम से मोती को हाथों पे झेलें।।
बहुत दूर से ये जो चल के है आई।
इन्हें भी तो हौले से दो बोल कह लें।।
चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें।।
ये सावन का मौसम,
घटा ये घनेरी।
ये धरती की गोदी है चुलबुल छरेरी।
ये धनुवे की रंगीन आभा रुपेहरी।
चलो आओ बाहों में इन सब को लेलें।
चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें।।
ये स्वांति का नक्षत्र,
पिऊ पिऊ रटना।
ये दादुर का टर टर दिन रात करना।।
ये चुर चुर का पानी ये झर झर है झरना।
चलो आज इसमें ये तन मन भिंगो लें।।
चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें।।
ये पीपल की शाखों बँधे प्यारे झूले।
लगा ऐसी पींगें कि आकाश छू लें।।
वो मस्तों की टुल्लर यहीं आ रही है।
चलो छप छपाके गलियों में कर लें।।
चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें।
ये कजरी दे आल्हा ये ठुमरी का गायन।
ये मोरों का बगिया में मस्ती का नर्तन।।
लगे सारा उपवन खिला जैसे मधुबन।
चलो हम भी पैरों में घुँघरू बधा लें।।
चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें।।
ये कैसा नशा है ये खुशबू पनीली।
बिजुरी जो कड़के डरे गोरी भोली।।
ये जुगनू की चकमक किसे ढूँढती है।
चलो लुत्फ थोड़ा ये हम भी उठा लें।।
चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें।।
ये टिप टिप टिपाते मद्दम पनाले।
हवा के परों पे झुलाती हिंडोले।।
ये सर सर सराती वो बौछार डाले।
चलो भूल हस्ती जरा इन में न्हा लें।।
चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें।।
vvv
आइना कहता रहा
आइना कहता रहा कि जानता हूँ मैं तुम्हें,
मैं मुकरता ही गया कि तुम मुखौटा पढ़ रहे।
पर कोई बैठा छुपा है सक्ष मेरी ही खुदी में,
रात दिन बस बिम्ब दोनों द्वद्व कैसा लड़ रहे।।
चाँदनी कब थी अलग जो चाँद में नभ में घुली,
रोशनी को सूर्य से ना तुम अलग देखा करो।
इस सनातन सत्य को तुम जान लो पहचान लो
इस जगत की अस्मिता को ईशमय देखा करो।।
सृष्टि का साकार दर्शन उस परम का दर्श समझो,
जो पवन छू कर गई यह है मृदुल स्पर्श उस का।
भूख भी उसने बनाई अन्न भी उसने दिया है,
वह पचाता जठर में खेल यह सब है उसी का।।
पाँच भूतों,
पाँच तत्वों, पाँच प्राणों से बनाया
इन प्रपञ्चों से बुना है यह महा जंजाल समझो।
इन्द्रियों के पंचकों से इस कर्म का साधन लगाया
बुद्धि, मन और चित्त जोड़े यह तेरे भीतर सजाया।।
ज्योतियों की है परम ज्योति जो हमें ना दीख पाती
सूक्ष्मतम प्रज्ञा हृदय में ज्ञान का दीपक जलाती
चेतना बन प्रभु हमारे सर्व में बसता निरन
वह जगाता,
वह चलाता चेतना को निष्प्राण को
आधि दैहिक आधि दैविक आधि भौतिक प्यास भी वह दे रहा है
vvv
कौन दस्तक दे रहा है।
वेदना के द्वार पर यह कौन दस्तक दे रहा है ?
क्यों पराई पीर को अपने हृदय में बो रहा है?
टाँग दी अपनी खुशी अपने मकां की खूंटियों पर
छोड़ फूलो की मसहरी कंटकों पे चल रहा है।।
कौन दस्तक दे रहा है।।
कौन है वह सक्ष जिस के कण्ठ में है प्यास तेरी।
कोई भूखा गर रहा तो सामने की थाल फेरी।।
जागती संवेदना जब दस्यु भी कवि हो रहा है।
सो रहा जब जगत यह मौन साधक जग रहा है।।
कौन दस्तक दे रहा है।।
हाथ में ले कर मथानी शास्त्र को जब जब बिलोया।
सूत्र का नवनीत ले फिर थाल में तेरे संजोया।।
जिन्दगी के कायदों को माला में ऐसे पिरोया।
कौन है जिसने सुधा को छोड़ के विष पी रहा है।।
कौन दस्तक दे रहा हैl।
तीन कालों में विचरता कुछ ढूँढता किसके लिये।
उस घडी के उन पलों को क्या कभी उसने जिये।।
काव्य की पावन धरा तू देख कितनी उर्वरा है।
खेत तेरा हो भले वह बीज आ कर बो रहा है।।
कौन दस्तक दे रहा हैl।
vvv
मेरा उपवन बुला रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है ।
थोड़ा पंखों को दो विराम
मेरा उपवन बुला रहा है।।
तुम पहुँचोगे जगह जहाँ पे
प्यारा गाँव हुआ करता था।
उसे शहर ने निगल लिया है
एक चौपाल हुआ करता था।।
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है।।
आम, नीम,
बड,
पीपल की
ठण्डी छाँव घनी रहती थी।
उनके शव तक नही बचे है
अब सन्नाटा पसर रहा है।।
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है।।
सुखद नीड़ था जहाँ बनाया
तिनके तक अब नहीं मिलेंगे।
वे मधुर गान तोता मैना के
सुनने को ना कहीं मिलेंगे।।
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है।।
ताल तलैया सूख चुके हैं
प्याऊ बस इतिहास हुई है।
पथ में छाँव बिछाता बादल
तक भी आना छोड़ रहा है।।
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है।।
दूर देश के प्रिय प्रवासी
मीलों तुम उड़कर आए हो।
मालव की माटी और पानी
अब कंकरीट वन उगा रहा है।।
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है।।
कोयल और पपीहे की तो
आवाजें सब बिदा हुई है।
नगर गाँव में हवा प्रदूषित
बोतल में जल बिक रहा है।।
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है।।
vvv
जिद कर बैठा हूँ
मैं तुम्हारी जीत और अपनी हार की जिद कर बैठा हूँ
रोशनी मीलों पीछे छोड़ अँधेरों से प्यार कर बैठा हूँ।
आईना ही झूँठ बोलता रहा मुझसे जिन्दगी भर
न जाने क्यों बुतों को ही मैं जिन्दा मान बैठा हूँ।।
ये माना जिन्दगी तो बुलबुला है क्या सफर इसका
मिली गिनती की जो सांसें भरोसा क्या करें इनका।
मगर जीना मयस्सर हो गया तो दो घड़ी जी लें
मिला ले धडकनें धडकन में, न ठहरे सिलसिला इनका।।
vvv
जीवन की चादर
जब जब जीवन की पतंग के
पेच कहीं ये उलझे हैं।
वाणी भी जो बोल सकी ना
तूने भाव सभी समझे हैं।।
जीवन की चादर करघे के
जब जब तार मेरे बिखरे हैं।
तब तब कृपा तेरी बरसी है
बिगड़े काज सभी सुधरे हैं।।
इस भीतर की तनहाई मे मैं
एकाकी जब जब हो पाता हूँ।
यह भीड़ कहीं खो जाती है
बस साथ तेरे रह जाता हूँ।।
उस खास घड़ी को जी कर ही
सदियाँ पल में जी लेता हूँ।
गरल भरे इस सागर में भी
अमिय घूँट कुछ पी लेता हूँ।।
अन्तःपुर के खोल किवारे
जब जब तू घर आता है।
मेरा अगला पिछला जीवन
कितना पावन हो जाता है।।
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अमर प्रीत मेरी
प्रीत मेरी देह संग ना मर सकेगी
प्रीत मेरी साँझ सी ना ढल सकेगी।।
प्रीत की न उम्र है ना परिधियाँ ही
प्रीत मेरी मेघ सी न गल सकेगी।।
प्रीत रूहों के मिलन का नाम है
प्राण में होता विलय जहँ प्राण है।
रूप का लालित्य बाहर हो खड़ा
बन्धनों से मुक्ति है और त्राण है।।
अग्नि भी ना दह सकी इस प्रीत को
सह सका ना क्यों जगत मन प्रीत को।
प्यास अधरों पर रुकी ले कण्ठ की
सुन पपीहा स्वाँति के प्रिय गीत को।।
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बिखर गए सब सपने
मेरी रचना मेरे सुर
बिखर गए सब सपने।
नयनों में दर्दों का सागर
इसीलिए आँसू खारे हैं।
जीत तुम्हारी सदा रही
हर बार हमीं हम हारे हैं।।
मन के खुले रहे वातायन
द्वार देहरी चौखट सूनी।
बाहर है बौराया मधुबन
धू धू जलती भीतर धूनी।।
हुई गुबारों संग सगाई
उजड़ी उजड़ी बस्ती है।
घाट घाट पर सन्नाटे हैं
बिन पतवारों की कश्ती है।।
टूटे श्यामल मेघों के वे
संग विचरने के अनुबन्ध।
पवन कहीं रूठी बैठी है
मुखर हुआ कैसा प्रतिबन्ध।।
पदचापों की आहट बिखरी
बिखरे बालू में सब सपने ।
सिसक रही प्राणों की वंशी
जग में किसे कहें अब अपने।।
vvv
कोरोना महामारी (कोविड -19)
जर्द पत्तों पर लिखूँ क्या
गत बसन्तों की इबारत।
खण्डहर के ईंट रोड़े
कह रहे उनकी शहादत।।
आज स्वर में भैरवी के
क्यों रुदन की कर्कशा है।
रोशनी के झुरमुटों में
मुर्दनी है, दुर्दशा है।।
इन प्रलय के विषधरों की
मृत्युमय फुँफकार गूँजी।
चढ़ गये शूली निरे जन
कुछ बची ना गाँठ पूँजी।।
कोई कहता यह नियति के
कायदे बस सन्तुलन के।
या कि सौदागर बड़े वो
मौत लिखते हाथ जिनके।।
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नेह की वही शपथ
चुभे शूल मेरे तलवों में
चीख तुम्हारी निकल गई थी।
टीस हुई जब मेरे दिल में
साँस तुम्हारी विकल हुई थी।।
करुण हृदय की, कथा रुदन की तुम्हें सुनाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।
तोड़ गई सपने प्रभात में
ऊषा की स्वर्णिम किरणें ही।
छोड़ गई रीती गागर सब
आशा पनिहारिन पनघट ही।।
इस एकाकी पथ पर उमड़े पतझार दिखाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।
यहीं कहीं अन्तस की गाँठें
खोल खोल रख डाली थी।
नील नयन के नील गगन पर
पलकों की चादर डाली थी।।
टूटे बिखरे मन की किरचें, तुम्हें बताने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।
आँगन आँगन बिरवा सूखे
पवन उकेरे कहीं जुन्हाई।
चंचरीक की गुंजन लगती
होली के दिन बिरहा गाई।।
झुकी की नीम की टहनी पर, तुम्हें झुलाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।
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बिन तुम्हारे क्या करूँगा
आज फिर संध्या खिली है।
रोलियाँ घन में घुली है।।
पर रुदन का साज ले कर,
पीर का आघात ले कर।
बिन तुम्हारे प्रीत का अभिसार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।
बीज स्वप्नों के सलोने।
हो रहे कितने अलोने ।।
मुट्ठियों से जो फिसलते,
रेत में गिर कर पिघलते।
बिन तुम्हारे नेह का अधिभार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।
लोचनों से अश्रु फूटे।
आस के अनुबन्ध टूटे।।
इस हृदय के द्वार सिसके, अंगना के रंग फीके।
बिन तुम्हारे आगमन गल हार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।
बाग महके शाख चहके
गुंजरित हो भ्रमर थिरके
सज रही सारी दिशाएँ,
कह रही अपनी कथाएँ।
बिन तुम्हारे दर्श के श्रृंगार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।
आज फिर संध्या खिली है।
रोलियाँ घन में घुली है।।
vvv
धरा का श्रृंगार
जब हृदय की भित्तियाँ रंगीन हों
जब शिराओं में प्रवाहित ओज हो
ताल लय से हो स्वरित सुर सर्जना
प्राण में रंजित रुचिर मधुमास हो।
रंग,
रस और रूप का आलेप ले।
यह धरा श्रृंगार खुद का कर रही।।
फूटती हो जव रुपहली रश्मियाँ
गा रही हो भैरवी सुरभित पवन
पीत पुष्पा अमलतासी वेणियाँ
स्वागतों में हो खड़े आतुर सुमन।
रंग,
रस और रूप का आलेप ले।
यह धरा श्रृंगार खुद का कर रही।।
vvv
अनकहे संवाद गूँजे
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो
गीत की हर पंक्ति में, फिर फिर सुनाई दे रहे हो।
क्या अभी भी रंग के, छ्पके हिये में ही पड़े है
जो पिरोये प्यार के पल , क्या अभी भी उर धरे हो।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
मन कभी तन से निकल कर, दौड़ता उन वीथियों में
खिड़कियों की सीखचों से, झाँकता है झिल्लियों में।
क्या वही पगण्डियाँ सब,
आज भी वैसी खड़ी हैं?
फुसफुसाती बतकही वे, क्या हृदय में ना गड़ी है?
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
याद है उन झुरमुटों के, बीच उगता चाँद वह भी
शीश का आभार काँधे,
हो रहा महसूस अब भी।
केश के विन्यास टूटे थे, महज इक अंगुली से
पंखुड़ी थी महमहाती, जो बिखरती अंजुली से।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
जब लगी मेंहदी महावर,
रंग राची थी हथेली
गीत, डफली,
ढोलकों से, सज्ज थी तेरी हवेली।
पार इसके क्या सुना था? गीत मन में गुनगुना था
उत्सवों की भीड़ में भी, एक बस मैं अनमना था।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
क्या कभी नेपथ्य के फिर, अनकहे संवाद गूँजे?
क्या कभी उन मंदिरों के, देव जा कर फिर न पूजे?
याद हैं वह पुष्प मुझको, देव प्रतिमा से गिरा था
बाँट कर दो भाग मे जो,
छिप छिपा हमने धरा था।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
तुम न थी तो कौन था वो,
सब तरफ मेरे खड़ा था
देह की गठरी खुली तो, कौन उस यम से लड़ा था।
क्या तुम्हारी बज़्म में,
चर्चे मेरे भी हो सके हैं
दौड़ तुम तक अब न होगी, उम्र के ये पग थके हैं।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
क्यूँ न जाने लग रहा है,
जिन्दगी दो फाड़ सी है
एक मेरे साथ अब है, दूसरी मन में धँसी है।
(चुटकियों में चुक गई वो)
तब पलों में चुक गई जो,
अब दिवा के स्वप्न सी है
गाँठ में बस याद की वो,
इक इमारत भग्न सी है।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
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उम्र कलम की कच्ची है
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
उम्र कलम की छोटी है यह
कुछ का कुछ कह जाती है
साफ नहीं बोली इसकी यह
कहते कहते तुतलाती है।
शाई केवल नीली ही थी
पर रंगों का संसार रचा है
जान नहीं बेजान भले है
भावों का अम्बार भरा है।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
झुग्गी में मुनिया को रोते
देख सिसकने लगती है
हलकू की ठिठुरन देखे तो
खुद भी कँपने लगती है।
सहलाती पाँवों के छाले
मरहम हाथों से मलती है
लँगड़ाते शैशव को पकड़े
हौले हौले संग चलती है।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
चूल्हे में न जली आग पर
पेट झुलसता है भूखों से
किलकारी मरते देखी जब
लल्ली की गुमसुम चीखों से।
यह मासूम कलम रोती है
उसके संग संग खोली में
मदद जुटाने दौड़ी जाती
माँग रही लटपट बोली में।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
जब से सुना किसी कुटिया में
लाल बहादुर जन्मा था
और कहीं पर एक कलाम का
वह कमाल का कर्मा था।
डायर का वह महाकाल भी
कुटिया में ही पला बढ़ा था
विष्णु गुप्त ने भारत माँ के
ग्वाला माथे एक मढ़ा था।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
तब से दर दर भटक भटक
गुदड़ी,
कुटिया ढूँढ रही है
ऐसे लाल कहीं मिल जाए
उन सपनों में झूल रही है।
इक दिन उम्र पकेगी इसकी
फिर इक नया सवेरा होगा
भारत माँ के भाल सजाने
फिर से कोई चितेरा होगा।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
इसमें बाबा की झिड़की है
और अम्मा का प्यार भरा।।
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अनमने हैं घाट पनघट
मौन लहरें हैं बुझी सी अनमने हैं घाट पनघट
एक दिन फिर टूट कर बन गया इतिहास नटखट।
थक गई नावें सभी ये हैं खुले मस्तूल फिर भी
लौटती पनिहारियाँ भी निज घरों को आज झटपट।।
जोहता है बाट किसकी प्यास नजरों में लिये यह
देह-मन गीले लिये यह कौन साहिल पर खड़ा है।
वह न लौटेगी कभी भी जान कर अनजान हो कर
अनगिनत मनुहार ले कर साँस साधे क्यों खड़ा है।।
बन्दिनी सब कामनाएँ आस सब सूली चढ़ी हैं
अर्चियाँ डूबी तिमिर में कुन्द सी साँसे पड़ी है।
साँझ से पहले अँधेरों ने पसारे पंख कारे
सज सँवर काँधे चढ़ी वो प्रीत की डोली खड़ी है।।
लेख गुम्फित है नियति के लिख गए आधी कहानी
प्राण की संचेतना क्यों छीन कर अधबीच मानी।
क्यों बिछी चादर प्रणय की जब बिखरना तय किया था
क्यों हृदय में प्रीत डाली फिर लिखी टूटी कहानी।।
देखता ही रह गया वह उठ रहे नभ के रवों को
कौंधती उन बिजलियों को और स्वप्नों के शवों को।
बिन अवध साकेत कैसा, प्राण बिन नर देह कैसी
यह धरा कैसी लगेगी तोड़ कर देखो ध्रुवों को।।
क्रन्दनों के गाँव में हम द्वार की दहलीज पर ही
अनमने आधे अधूरे और सूखे ओंठ ले कर।
घुट रहे मन प्राण अपने जो गये तिल तिल बिखर
भाग्य के अभिलेख कैसे ढा गया कैसा कहर।।
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दुबका बैठा जीवन है
इस पसरे सन्नाटे में यह जीवन दुबका बैठा है।
हिरनो जैसी दौड़ छाेड़ टूटी खटिया पर लेटा है।।
घर में हैं घरवाले फिर भी घर क्यों खाली लगता है।
शोर थमा बाहर का फिर नीरव क्यों गाली लगता है।।
वही हवा और पुष्प सभी वैसी ही सौरभ देते हैं।
फिर भी डरते डरते हम एक पाँव डगर पर धरते हैं।।
जाने कौन दिशा से आ वह चुपचाप पटखनी दे देगा।
हम डरे डरे सहमे घर में कब हमें फिरकनी कर देगा।।
तेरी गलती की सजा मुझे गर तू चुप ना बैठेगा।
तेरे पापों की गठरी को जबरन मेरे सिर रक्खेगा।।
इसीलिये डण्डा ले कर सड़कों पर शासन उतरा है।
संयम की अच्छी साध लिये मानव घर में पसरा है।।
तू छोड़ फिक्र इस दुर्दिन की अच्छे दिन जल्दी आवेंगे।
फिर से फुलबगिया महकेगी घर घर दिये जलायेंगे।।
फिर नई सुबह में नया जोश जीवन फिर से महकेगा।
मेरे इस आँगन में बबली बबुआ फिर से ठुमकेगा।।
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मधुगीत गुन गुन कर रहा
शब्दो के इस महारास में,
अर्थों के मधुरिम प्रभास में
भावों में, अहसासों में,
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।
दो हृदय दो तन विकम्पित,
ताल सुर हैं द्रुत विलंबित
बँध पुलिन में बह रही है
यह धार सरिता की स्वरित।
आगतों के स्वागतों में
पुष्प के मकरन्द मुखरित
घन गरज की भेरियाँ सुन
नाचते है मोर प्रमुदित।।
तार वीणा के जगाने मधुमीत तुन तुन कर रहा है।
गीत गुन गुन कर रहा है।।
कोकिला के कंठ जागे,
चातकों के भाग जागे
उपवनों में गंध भारित
चहुँ दिशा में पवन भागे।
ताल में बनफूल पादप
पात ने माँडी नव रंगोली
झर झराती झिरनियों के
मधुरवों के रार जागे।।
श्वाँस में प्रश्वाँस में मनमीत कुन मुन कर रहा है।
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।
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शब्द में हैं अर्चनाएँ
है अभी तो रक्त में
घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।
रात जागी कामिनी के
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी
कह रही इन शतदलों में।।
vvv
खपरैली बस्ती में
आओ फिर लौट चलें,
खपरैली बस्ती में
भींच लिये ओंठ और भींची जब आँख मेरी
मन ही मन लगता है अंबर ने पाँख धरी
भैंसों की पीठों पर फिर चढ़ बैठें मस्ती में
पोखर के छिछले से पानी की छप छप में
कनुवे की किलकारी गूँज रही ढप ढप में
आओ फिर लौट चलें,
खपरैली बस्ती में।
खपरैली बस्ती में।।
तन मन सब भींग गया यादों के झुरमुट में
चूजों संग दौड़ रहा मन घूरे पर सरपट में
बोल रही शीशी में पनचक्की पुक पुक कर
कोयल जहँ कूक रही आमों के उपवन में
भर ले पोटाश जरा लोहे की गजगुण्डी में
लहसुनिया फोड़ें भित्ती पर चल मण्डी में
खपरैली बस्ती में।।
चाचा के चौंतर पर खेलें चंग पौ और चौपड़
तारा और मुन्नी की सुन पाँचों की खड़ खड़
मस्तानी टुल्लर जो खेल रही है लंगड़ी भी
खेलें ढप्पी और पव्वा नीम तले दुकड़ी भी
अन्नी-चन्नी की धूम मची चन्दन के औसारे
कपड़े की गेंद बना गधामार टप्पे भर मारे
खपरैली बस्ती में।।
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मौन है चिर प्रीत मेरी
मौन है चिर प्रीत मेरी शब्द के विनिमय नहीं है
नयन भींगे वेदना की धूप में अभिनय नहीं है
मौन रजनी,
मौन परिमल, मौन है वाचाल तटिनी
मौन उर में बन्दिनी इस प्रीत का परिणय नहीं है
चल चलें फिर गाँव अपने, स्वप्न पाँखी खोल डैने
इस हृदय की प्यास का तो शोर से परिचय नहीं है
मौन अधरों के निलय की रक्तिमा कुछ कह रही है
इस निरे निस्पन्द में भी भाव सरिता बह रही है
इन पलक की ओट में ये पुतलियाँ कब चुप रही है
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल लें गलबाँह अपनी
इस नगर की धुन्ध में तो सूझता कुछ भी नहीं है
सीख ले इस मौन से तू इस गगन के इस धरा के
गीत सुन तू भाल विधु की चाँदनी की उस सुरा के
धड़कनों की मौन कथनी कह रही मन की त्वरा के
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल दें अनुबन्ध सारे
प्रीत की पावन नगर में सुर सजा लें उर धरा के
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भोर की रश्मियाँ
भोर की संकल्पना जगने लगे तो
काट बन्धन तिमिर को अवसान देना
रात भर लड़ती रही है रश्मियाँ
प्रात को उस पल ज़रा सम्मान देना ।।
हो रही हिंगुल प्रभाती सर्जनाएँ
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी वे वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मि को अधिमान देना।।
vvv
सपने सारे संग ले गये
तुम जो गये गये, संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।
क्यों आये क्यों गये जिन्दगी की इस चौखट पर
मैं था मेरी आस उनींदी बाट जोहती तेरी तट पर
बोई प्रीत हथेली सरसों जैसे सूख गई उगते ही
लौटे नहीं रंग जाकर फिर तुमने जो छींटे मनघट पर
तुम जो गये गये, संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।
वैसे तो हर माह अमावस का अँधियारा आया है
अबकी बार महीना पूरा अँधियारा ले कर आया है
जो लगते थे कभी सुहाने उन उड़ते मेघों ने मेरे इस
व्यथित हृदय की तप्त धरा पर क्रन्दन ही बरसाया है
तुम जो गये गये, संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।
तुम तो गये गये पर मेरे सपने सारे संग ले गये
तूफानों में घिरी नाव को ऐसे कैसे भँवर दे गये
उस पतंग का ठौर कहाँ जो भाग्यचक्र ने काटी हो
रीता कंठ रुँधी आवजें गीत अधर पर धरे रह गये
तुम जो गये गये, संग मेरे सपने सारे संग ले गये
मेरे उर से निकले ऑंसू पलकों पर ही धरे रह गये।।
vvv
तुम कहाँ चले
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले
अपनी गहन पिपासा ले कर आशा के मृग जीते थे
नभ में मेघों के शावक से सपने दौड़े फिरते थे।
अन्तस की सूने जंगल में कुछ शूलों फूलों के संग
किंशुक अपने शुष्क अधर से दावानल को पीते थे।।
पतझड़ में मन के शलभों की प्रीत जगा कर कहाँ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।।
सागर की छाती पर मैं था लहर लहर सा खेल रहा
शिखर चढ़े ध्वज सा मैं कितने अंधड़ को था झेल रहा।
सूने पनघट रीती गागर थका थका अभिसार लिये
मरुथल की तपती ज्वाला में यहाँ वहाँ था डोल रहा।।
ऐसे में रूखे अधरों पर प्यास जगा कर कहाँ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।।
तुमसे पहले इस दरपन में मुखड़े आ कर चले गये
धड़कन के तारों को यों ही हिला डुला कर भले गये।
उनके गीतों की धारा में पागल मन ना बहा कभी
खिली साँझ में द्वार देहरी दीप जले नित नये नये।।
मन के गोपन कोने की तुम आसंदी क्यों छोड़ चले।
अन्तस की सोई पीड़ा को यहाँ जगा कर कहाँ चले।
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यों ही मुझको भूल सकोगी?
टूटे दिल की किरच किरच में देखोगी प्रतिबिम्ब गड़ा
पाओगी मुझको ही जब तुम धूल भरा सा वहाँ पड़ा।
तब भी तुमको ही ढूँढेंगी रूह मेरी बिखरे सपनों में
पाओगी मन के आँगन में मुझको अब भी वहीं खड़ा।।
जितना सच था बचपन उतना मेरा प्रेम निवेदन सच है
जितना रस था बीच हमारे मुझमें शेष अभी भी सच है।
ज्वालाओं में तप कर निखरे मन कुन्दन सा उतना सच है
जितना पावन धरा गगन का रिश्ता उतना रिश्ता सच है।।
vvv
तिरछी लकीरें
बन गई पगडण्डियाँ ये हाथ की तिरछी लकीरें
खो गई मंजिल बची बस हाथ की तिरछी लकीरें
इस रोशनी के गाँव में हैं आ बसे सब ओर साये
भाग्य की कोरी घिसावन लग रही तिरछी लकीरें
इन लकीरों ने मुझे भी था कभी तुम से मिलाया
प्रीत का प्यारा रसायन था कभी तुम ने पिलाया
अब अचानक खो गई वे हाथ की सारी लकीरें
लोरियाँ गा कर कभी था कष्ट में मुझको सुलाया
दिल का दर्पण टूट गया
अगर प्रेम है पूजा तो फिर वह पीछे क्यूँ छूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?
परवाजों के पैरों में बँध उड़ उड़ तुम तक जाता था
निर्मम बैरी बाज समय आ बीच राह क्या लूट गया?
क्या इतना है सहज मिटाना खिंची लकीरें पत्थर पर की
अगर प्रेम सागर था फिर क्यूँ गागर सा यह फूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया
प्रेम निलय था रूहें जिसके अन्तःपुर में बसती थी
प्रेम वाटिका में मधुवन्ती पावन पवन विचरती थी
किसलय की कोमल कलिकाएँ लू पीकर भी खिलती थी
क्या माली ही स्वयं बसन्ती बाग बहारें लूट गया?
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?
प्रीत हमारी अग्निपरीक्षा दे दे कर ना कुम्हलाई
मीरा बन कर पिया हलाहल कोई आँच नहीं आई
टूटे तार भले वीणा के फिर फिर वह आलाप जगाई
फिर हलके से कंपन से ही दिल का दर्पण टूट गया
सह न सका हलके झटके को तिनके सा क्यूँ टूट गया?
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गीत गाता हूँ मैं
अक्षरों से शब्द तक का यह सफर
चेतना फिर हो चले जिस में प्रखर
भाव की उत्प्रेरणा जब जागती है
तब कहीं इक गीत होता है मुखर
वेदना, संवेदना,
प्रतिवेदना मिल
हो गलित इक धार में बहने लगे
खुद बहे पहले, सभी उसमें बहें
तो समझ लो गीत हैं उठने लगे
गीत का उत्थान भी इक ज्वार है
गीत काली रात का अभिसार है
गीत भावों की विकल अभिव्यंजना
गीत अधरों का मधुर श्रृंगार है
प्रियतमा के नैन से जब नीर बहता
श्वाँस में प्रश्वाँस में है गीत चलता
जब प्रणय की रागिनी में हो घुला
छ्न्द बन्दों में स्वयं ही गीत ढलता
गीत करुणा की मृदुल सी धार है
गीत घुंघरू की मुखर झंकार है
गीत दिल के बादलों से झर रही
झिरमिराती सी मधुर मनुहार है
गीत हैं उत्सव, हैं गीत भी कलरव
स्वर्ग भी हैं ये,
हैं और ये रौरव
सुख के और दुःख के अधिमान भी
हैं पुरातन के पुरोधा और अभिनव
गीत हैं आलाप उठता कण्ठ से
गीत भीगा है कहीं मकरन्द से
गीत उठता नाद है मिरदंग से
झर रहा अनुराग हो हर छ्न्द से
गीत लय है गीत सुर है ताल भी
गीत गति है गीत मद्धिम चाल भी
शौर्य का आह्वान करते गीत हैं
गीत मारक शक्ति भी है ढाल भी
गीत गाथागीत बन जग में रमा
लोकरंजक गीत ने बाँधा समा
लोकमंगल गीत बिन कैसे शुरू
गीत ही हर उत्स की है मधुरिमा
प्रीत की पावन धरा में बीज सा
भावना के सिन्धु में है मीन सा
पुष्प के हर अंग में अभ्यंग में
महमहाता गीत है मधुमास सा
गीत जीवन जीवनी के गा रहा
प्रेम की पगडण्डियों पे ला रहा
एक बन्जारा समझलो आज यह
कारवाँ के गीत अपने गा रहा
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झुर्रियों की शक्ल में
झुर्रियों की शक्ल में इस उम्र ने लिक्खी कहानी
सिलवटों के जाल पल पल कह रहे सब कुछ जुबानी
आँख से जो बह रहा यह खार रिश्तों के सफर का
कँपकँपाते ओठ कहते कुसकुसाती वो कहानी
सिलवटों के जाल में घुस कष्ट ने कस दी रकाबें
इन फटी बेवाइयों ने लिख रखी कितनी किताबें
चादरों में छुप छुपा कर जो बिलखते कौन जाने
फाड़ डाली जिन्दगी की अपनों ने सारी किताबें
याद के उठते बवण्डर,
हैं झेलते वे मौन रह कर
जब कुरेदा है किसी ने वे उगलते हैं फफक कर
जिन्दगी भर जो कमाया लाड़लों ने सब छुड़ाया
जब थका यह शुष्क पिंजर, अब न कोई दर,
न घर
भाग्य से उनकी कमाई हाथ इन के आ गई है
लोभ के भीषण भँवर से बुद्धि ही मारी गई है
एक दिन इनका भी ऐसा आयगा ये बेखबर हैं
चूर हैं कैसे नशे में नियति ही मति खा गई है
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गाओ रे! झूम झूम!
गान मस्ती के उकेरो
रागिनी स्वर ले स्वयं ही
कण्ठ में भर जायगी
झनझनाती पायलों की
थाप पर थिरकन चले तो
क्या कामिनी रुक पायगी?
वह गत सुनाती जायगी
मौज में उड़ती पतंगे
देखती है कब जमी पर
डोर को भी टाँगती वह
नील नभ की खूँटियों पर
जब हवा के पंख लगते
खिलखिलाती जायगी
वह गत सुनाती जायगी
बूँद बन कर जा मिलो तुम
धार जो मस्ती में बहती
या मिलो बरखा में तुम जो
झूम कर मस्ती में झरती
या बनो शबनम सुबह की
ऋतु शरद वो सुहानी आयगी
वह गत सुनाती जायगी
है जरा सी जिन्दगी ही
पुष्प की और गन्ध की भी
गोद में वह पालता भी
बाँटता मधुर मकरन्द भी
जानता निज कंटकों से
सब पंखुड़ी छिद जायगी
वह गत सुनाती जायगी
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इस तरह सिमट गए
शाम है धुआँ धुआँ
गगन पहन के गेरूआँ
चला धरा की गोद में
है कँप रहा रुआँ रुआँ।
चाँद तारे टँक गये
लो शामियाने सज गये
धरा गगन सुहाग भर
कुछ इस तरह सिमट गए।।
मिट गए है फासले
ठहर गए हैं काफिले
वे हार के सिंगार के
सिलसिलों पे सिलसिले
हैं ढोलके ढमक उठे
समीर से पलास के
माँग भरती किंशुकी
गीत सुन हुलास के
झिंगूर झूम गा उठे
प्रपात झरझरा उठे
किलोल कर रहा मदन
सरित स्वरों की ताल पर।
मराल माल धर धरा
विराग छोड़ती मही
बिछे हुए जमी जमी
माधवी, कुमुद,
जुही।।
अभी विहान दूर है
पात सरसरा रहे
विहाग राग भैरवी
है बंदि वृन्द गा रहे
चकोर चन्द्र चाँदनी
मनोज मान मर्दिनी
प्रणय प्रखर प्रमोद है
धरा गगन सुहाग भर
कुछ इस तरह सिमट गए।।
चल रे जीवन उछल उछल
ए जीवन के तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल
जलधारा प्राणों की ले कर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल।
जन्म मृत्यु के बीच क्षितिज है तेरा यह क्रीड़ांगण
इसमें भर उल्लास वृती हो रथ अपना दौड़ाता चल।।
चल रे जीवन उछल उछल।।
चल रे चल तू अमल तरल।।
तुझमें सूरज की आभा है तुझमें बसी चन्द्रिका शीतल
थामो वल्गा ऋत की कर में धर्म कर्म के चक्र सबल।
कुचलो निष्ठुर बाधाओं को, हहर हहर रथ की गूँजे
गूँजें यश के सामगान ये पथ भी होवे सुगम सरल।।
चल रे जीवन उछल उछल।।
चल रे चल तू अमल तरल।।
खुले नयन से खुली दृष्टि से खुले खुले मन के वातायन
खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन।
तू अजेय प्राणों के स्वामी कण कण करता यश गायन
फूँको पाञ्चजन्य ऐसा जो कम्पित कर दे धरा गगन।।
चल रे जीवन उछल उछल।।
चल रे चल तू अमल तरल।।
पद प्रहार से बाधा कुचले पौरुष से उत्तुङ्ग शिखर
हुँकारों की टकराहट से चट्टानें भी जाएँ बिखर।
धरती से अम्बर तक यश की ध्वजा पताका जाय फहर
लिखो कहानी ऐसी अद्भुत जग में चमके भाल प्रखर।।
चल रे जीवन उछल उछल।।
चल रे चल तू अमल तरल।।
(गीत ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त-37 से प्रेरित है। )
क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम्।
कण्वा अभि प्र गायत।। (1:37:1:)
संक्षिप्त परिचय
नाम - रामनारायण सोनी
माता - स्व. श्रीमति दरियावबाई सोनी
पिता - स्व. श्री शंकरलाल सोनी
सहधर्मिणी - श्रीमति शकुन्तला सोनी
शिक्षा - बी.ई. (इले., एस.जी.आय.टी.एस. इन्दौर)
सेवा - म.प्र. विद्युत् मण्डल से सेवा निवृत्त
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शाकुन्तलं
25 ए, ब्रजेश्वरी मेन
इन्दौर 452016 , (मध्य प्रदेश)
चलभाष
+919340761477, e mail -
soniwwz@gmail.com
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